शीर्षक औरत और मर्द
शीर्षक 🌸 औरत और मर्द 🌸
रचनाकार:- शाहबाज़ आलम “शाज़”
मर्द जो होते हैं, अपनी गलतियों को छिपा लेते हैं,
औरत की एक भूल पर, तमाशा बना लेते हैं।
कभी अहंकार में, कभी झूठी शान में,
दोनों ही उलझ जाते हैं ज़िद की आन में।
मर्द कहे — “मैं कमज़ोर नहीं”,
औरत कहे — “मैं मजबूर नहीं।”
पर सच तो ये है —
दोनों अधूरे हैं, एक-दूजे के बिना,
एक धूप है, तो दूसरा छाँव है ज़मीं का।
अगर समझ जाएं एक-दूसरे की तकलीफ़,
तो ज़िंदगी भी मुस्कुरा उठे, जैसे कोई नई तमीज़।
शाज़ कहता है —
ना औरत छोटी, ना मर्द बड़ा,
इंसानियत ही असली तराजू रहा।
अब ये कविता नफरत नहीं, सोच जगाती है
और इसमें “शाज़” की वो पहचान भी है,
जो सच को भी शालीनता से कह देती है।
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