ग़ज़ल 221 2121 1221 212
ग़ज़ल 221 2121 1221 212
आशिक़ जो इश्क़ में मरे मुरदार भी नहीं,
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं।
जिन लोगों ने बनाया है कानून मुल्क का ,
ख़ुद के ग़ुनाहों के लिए स्वीकार भी नहीं।
ऊंचा मुकाम पाने युवा कुछ भी कर रहे,
ना जज़्बा देश प्रेम का संस्कार भी नहीं ।
कैसे मनाऊं ईद न महताब ही दिखा,
औ आज छत पे आपका दीदार भी नहीं ।
उनकी ग़रीबी लुट गई पैसा भी ना मिला,
उनके ग़मों का कोई तलबगार भी नहीं।
हारेगी उनकी फ़ौज़ गो ज्यादा हैं संख्या में,
ना है भरोसा खुद पे औ सरदार भी नहीं।
पैसों में बिकना सीख गये लोग आज के,
ईमान तो बचा न था ख़ुद्दार भी नहीं।
अब रिश्ता दोनों क़ौमों का दानी बिखर चुका ,
अब उनके बीच यारों नमस्कार भी नहीं।
( डॉ संजय दानी दुर्ग सर्वाधिकार सुरक्षित )