चाहता नहीं रिश्ता ए जिन्सी मैं
चाहता नहीं रिश्ता ए जिन्सी मैं
फिर क्यूँ ये अजब सी ऐंठन है
वो सामने हो तो छूने से डरता हूँ
और ख्यालों में अंगों पे चुंबन है
ये बदमिजाजी है इस जवानी की
या सच में होती तो कोई टूटन है
प्रेम को प्रेम की ही नजर – देखूँ
पर दिल और जिस्म में अनबन है
वहीं पर बर्बाद होना चाहता हूँ
जहाँ हवस मिटाता एक आँगन है
वो हुस्न संभाले तो संभल जाऊँगा
जिसके बदन में अभी यौवन है
ये गज़ल नहीं है ये जानता हूँ मैं
मगर हमउम्र दोस्तों का दर्पण है।
KAVIRAJ