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9 Nov 2025 · 1 min read

#तेवरी...

#तेवरी…
पढ़े लिखे चप्पल चटखाते।
(प्रणय प्रभात)

झूठ बोल के गाल बजाते ठीक नहीं लगते।
मत समझाओ तुम समझाते ठीक नहीं लगते।।

हाथ रहे जो साथ हमेशा सिर्फ़ अधर्मों के।
धर्म पताकाएं लहराते ठीक नहीं लगते।।

पान की लाली जैसी गाली जिनके होठ सजे।
वेद ऋचाओं को दोहराते ठीक नहीं लगते।।

बंदर भालू खूब नचाओ अगर मदारी हो।
इंसानों को नाच नचाते ठीक नहीं लगते।।

ताज लगा के तख्ते संभालें अनपढ़ बुरा नहीं।
पढ़े लिखे चप्पल चटखाते ठीक नहीं लगते।।

मुंह में राम बगल में चाकू चाल हलाकू सी।
नैतिकता का पाठ पढ़ाते ठीक नहीं लगते।।

इनका काम सांप से लड़ना सदा सुहाया है।
हमें नेवले बीन बजाते ठीक नहीं लगते।।

मन ही मन में फूल फूल के कुप्पा हो जाओ।
सरेआम इतना इतराते ठीक नहीं लगते।।

बड़े सूरमा बनते हो तो ख़ुद लड़ कर देखो।
मुर्गे तीतर रोज़ लड़ाते ठीक नहीं लगते।।

पास बैठ के पींग बढ़ाने वाले तुम जैसे।
सच पूछो तो आते जाते ठीक नहीं लगते।।

याद रहे प्यासे की बस्ती में सूखे बादल।
भाषण वाली भांग पिलाते ठीक नहीं लगते।।

संपादक
न्यूज़&व्यूज
(मध्यप्रदेश)

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