ये इश्क़ ए समंदर है इसकी कोई थाह नहीं है
ये इश्क़ ए समंदर है इसकी कोई थाह नहीं है
डूबा जो इकबार होगा फ़नाह कोई गवाह नहीं है II
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हस्तियाँ ख़ाक हुई ना जाने कितनी इस चाह में
उठाई है मशाल जिसने उसे कोई परवाह नहीं हैं II
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कुलदीप दहिया “मरजाणा दीप”