"कतकी का है मेला.."
विगत कार्तिक पूर्णिमा 5 नवम्बर 2025 को इमलिया घाट ज़िला लखीमपुर-खीरी (गोमती नदी के तट पर एक प्रसिद्ध स्थल जहां इस सुअवसर पर कतकी का मेला लगता है) जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रस्तुत हैं इस मेले की कुछ झलकियां –
“कतकी का है मेला..!”
तड़के उठिकै आज घरैतिन,
डाले अजब बवेला।
नयो घाघरो लाउ, नाइ तै,
मैं ना जावहुं मेला।
जइस-तइस समुझाइ,
दिलाया हमने उन्हें आसरा।
बैचमीट जो पड़ै आगरा,
तब तौ लेउं घाघरा।।
लहड़ू, ट्रैक्टर, बाइक, आटो,
ने सब रस्ता घेरा।
रिक्शा, कार, साइकिल का भी,
चला हजूम घनेरा।
बढ़ी भीड़, कोई संभले कैसे,
गज़ब है रेलमपेला।
किसने किसको मारी कुहनी,
किसने किसे ढकेला।।
बोलेरो चढ़ ठांय -ठांय कर,
जलवा भले बिखेरा।
ठाकुर ढू़ढैं पर्स,
जेबकतरे थे, कर गए खेला।
समझ न आए आज किसी को,
किसने किसको छेड़ा।
अमर प्रीत की अमर कहानी,
आई मिलन की बेला।।
खेल दिखाता, चतुर मदारी,
सर्कस के संग झूला।
चूल्हा -चकिया, सब कुछ मिलता,
“कतकी का है मेला”।
गरम जलेबी, सेउ, समोसा,
अमरूदों, संग केला।
लाइन थी पर वहां, जहां पर,
सजा, चाट का ठेला।।
बांचत कोउ भविष्य,
दिखावत जादू नया-नवेला।
गुरू रह गए गुड़ ही, लेकिन,
शक्कर बन गए चेला।।
बच्चे-बूढ़े, हर कोई
सामान कुछ न कुछ लेता।
ख़ुश हैं दोनों रामकृपा से,
क्रेता और विक्रेता।।
ऊंच नीच मिट जाए,
घूमे मालिक संग कमेरा।
रामलखन संग घूमें जुम्मन,
राधा संग हुमैरा।।
बीत चुकी हर बात भुला दो,
छोड़ो यार झमेला।
मेल आज हो जाए सबमें ,
रहे न कोई अकेला।
“आशा” और निराशा का भी,
खेल बड़ा अलबेला।
सब मिल, दो पल मौज मना लो,
दुनिया भी इक मेला..!
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