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10 Nov 2025 · 2 min read

मायकेरिया

व्यंग्य

मायकेरिया

एक माइक – ‘भाई. बहुत परेशान हूँ।’
दूसरा माइक – “क्या हुआ ?’
जो भी आता है.’मुझे छोड़ता ही नहीं।’
-मेरी भी यही हालत है। लोग जोर जोर से चीखते हैँ।
“क्या करें? कुछ समझ में नहीं आ रहा?”
हमको आवाज़ उठानी चाहिए
“कहाँ उठायें ? हमारा तो कोई आयोग भी नहीं।’
-सुन भाई। यह हमें बनाया किसने? भगवान बनाता तो तकदीर देता?
“कोई एमिल बर्लिनर था। 1877 में हमको बनाया था।”
-तब तो हम बहुत सीनियर हैं। ह्यूमन राइट कमीशन में जा सकते हैं?
“वहां जाकर क्या होगा? उसकी कौन सुनता है? हमारे जिस्म से लोग खेलते हैं। भोंकते है?”
-ऐसा नहीं भाई। मुझे तो सुरीली आवाज सुनने को मिलती है। जब कोई कमसिन मुझे छूती है, सिरहन दौड़ जाती है। जी करता है, खराब हो जाऊं? ठीक करने के बहाने और स्पर्श करेगी।
‘अपनी किस्मत कहां। एक बार वायर खराब हो गया। सब मुझे कोसने लगे। माइक खराब है।’
-तूने एक बात नोट की। हम दोनों काले ही क्यों हैं? गोरे क्यों नहीं।
“हां यार। हम तो वेस्ट इंडीज कलर के हैं? वो उजले। हम काले?”
-हमारे पास तो सभी बड़े बड़े लोग आते हैं। कामिनी। गामिनी। बड़े बड़े मंत्री। पीएम। सीएम। हमारी वैल्यू है।
‘अभी कुछ दिन पहले की बताऊं। एक महिला ने चार बार ड्रेस बदली। बार बार कहती रही..माइक पर बोलना है। क्या यह अच्छी लगेगी? कितना ख्याल करते हैं, लोग हमारा? रे!”
-अरे। तेरे लिए नहीं। पब्लिक के लिए तैयार हो रही थी।
“तो क्या? बोलेगी तो माइक पर। क्या सुरीला स्वर था उसका…आह ( ठंडी सांस)। आज भी उसकी याद आती है। एक घंटे मेरे पास रही।”
तेरी किस्मत अच्छी है भैया। मेरी किस्मत में तो वीर रस के कवि और नेता ही आए हैं। दोनों ही चीखे। पाकिस्तान समझकर फेंटे।

पार्ट 2
जब लोग हेलो टेस्टिंग टेस्टिंग बोलते हैं न? जी करता है, खराब हो जाऊं। हमारे मुंह पर झूठ बोलते हैं?
-क्या करें भाई? हमारी कोई एविडेंस भी नहीं। अगर होती तो सब बता देते। कोर्ट भी कागज मांगती है। माइक नहीं।
“अभी कुछ दिन पहले की बात सुन। संचालक बड़ा अकड़ रहा था। मैं खराब हो गया। उसको नानी याद आ गई। ”
-अरे। मैने भी यही किया। बड़े बड़े कवि थे। खराब हो गया। सबके पसीने आ गए।

“चल, छोड़। यह तो हमारा रूटीन वर्क है। माइक होकर तेरा एक्सपीरियंस क्या है? ”
भाई। जॉब तो अच्छी है। बस, एक बात अखरती है। कई बार संगीत की महफिल में फंस जाते हैं। एक ही बात बार-बार दोहराई जाती है। बोर हो जाता हूं।
मैं तो सौभाग्यशाली हूं। मुझे तो आजकल एंकर पकड़ती हैं।

दो माइक का संवाद खत्म नहीं हो रहा था। दोनों चिपके पड़े थे। कोई छोड़ने को तैयार नहीं था। जैसे टीबी, कैंसर, मलेरिया है। वैसे ही बड़ी बीमारी मायकेरिया है। पहली बार खुद के हाथ पैर कांपते हैं। फिर दुनिया कांपती है। इसका कोई इलाज नहीं। लाइलाज है। गोरे गोरे मुखड़े पर काला-काला चश्मा।

तभी तो..! माइक का रंग काला है। ताकि हम सफेद झूठ बोल सकें।

सूर्यकांत
10.11.2025

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