पिता की खुशी बेटी में
शीर्षक: पिता की खुशी बेटी में
रचनाकार – शाहबाज़ आलम “शाज़”
एक बाप की खुशी,
उसकी बेटी की मुस्कान में होती है,
खुद चाहे टूट जाए हज़ार टुकड़ों में,
पर उसे टूटने की पहचान में नहीं होती है।
वो थकता है, मगर दिखाता नहीं,
आँसू आता है, पर बहाता नहीं,
क्योंकि उसे मालूम है —
बेटी की हँसी में ही उसकी ज़िंदगी बसती है।
पापा काम से घर जब भी आए,
बेटी से मिलके मन खुश हो जाए,
दिनभर की थकान पल में मिट जाए,
जब वो “पापा” कहकर गले लगाए।
जब बेटी पहली बार “पापा” कहती है,
तो जैसे खुदा सारी खुशियाँ दे देता है,
और जब वो विदा होती है…
तो मुस्कान के पीछे “शाज़” का दिल रो देता है।
बाप की खुशी बड़ी सादी होती है,
ना ताज, ना शोहरत की बात होती है,
बस बेटी की हर खुशी, हर मुस्कान —
उसके जीवन की सबसे बड़ी सौगात होती है।
(शाहबाज आलम शाज़ युवा कवि स्वरचित रचनाकार सिदो-कान्हू क्रांति भूमि बरहेट सनमनी निवासी)