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9 Nov 2025 · 1 min read

आज चुपके से मुझे वो अलवेली मिली थी,

आज चुपके से मुझे वो अलवेली मिली थी,
उसकी आँखों में नमी चेहरे पर माँसूमियत ढली थी,|

समय के इस भँवर में वो ही चल पढी़ थी,
मैं तो वहीं खडा़ था बस वो ही निकल पढी़ थी,|

ये कैसा था समय ये कैसी वो घड़ी थी,
कल तक जो रूला रही थी आज खुद ही रो पढी़ थी,।

Writer -Jayvind Singh Nagariya Ji

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