आज चुपके से मुझे वो अलवेली मिली थी,
आज चुपके से मुझे वो अलवेली मिली थी,
उसकी आँखों में नमी चेहरे पर माँसूमियत ढली थी,|
समय के इस भँवर में वो ही चल पढी़ थी,
मैं तो वहीं खडा़ था बस वो ही निकल पढी़ थी,|
ये कैसा था समय ये कैसी वो घड़ी थी,
कल तक जो रूला रही थी आज खुद ही रो पढी़ थी,।
Writer -Jayvind Singh Nagariya Ji