आर्य समाज और हिन्दी
आर्य समाज और हिन्दी
हिन्दी भाषा का विकास और उसका राष्ट्रीय स्तर पर प्रसार किसी संयोग का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे अनेक समाज-सुधारकों, राष्ट्रभक्तों और विचारकों के अथक प्रयास हैं। इन प्रयासों में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान आर्य समाज और इसके संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती का रहा है। आर्य समाज ने न केवल धार्मिक-सामाजिक सुधार का कार्य किया, बल्कि भाषा, साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी गहरी छाप छोड़ी। महर्षि दयानन्द का मानना था कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसकी मातृभाषा के बिना संभव नहीं है। इसीलिए उन्होंने संस्कृत और हिन्दी को भारतीय संस्कृति की आधारभूमि के रूप में प्रतिष्ठित किया।
महर्षि दयानन्द सरस्वती (1824–1883) भारतीय समाज के महान मनीषी थे। उन्होंने वेदों की ओर लौटने का आह्वान किया और अंधविश्वासों के विरुद्ध तार्किक चिंतन प्रस्तुत किया। उनकी दृष्टि में भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि समाज-निर्माण की धुरी थी। वे मानते थे कि संस्कृत और उससे विकसित भारतीय भाषाएँ ही भारतीय आत्मा को अभिव्यक्त कर सकती हैं।
महर्षि दयानन्द ने अपनी प्रमुख कृति ‘सत्यार्थ प्रकाश’ संस्कृतनिष्ठ हिन्दी में लिखी। यह ग्रन्थ हिन्दी गद्य लेखन की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें सरल, प्रभावी और तर्कपूर्ण हिन्दी का प्रयोग किया गया। इस ग्रंथ ने हिन्दी को धार्मिक और सामाजिक विमर्श की भाषा बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
10 अप्रैल 1875 को बंबई में आर्य समाज की स्थापना हुई। समाज का मूल उद्देश्य था – वेदों की ओर लौटना, अंधविश्वास और रूढ़ियों का विरोध करना, शिक्षा का प्रसार करना तथा भारतीय संस्कृति का पुनर्जागरण करना। इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए आर्य समाज ने हिन्दी को माध्यम बनाया। आर्य समाज ने हिन्दी को इसलिए अपनाया क्योंकि यह उत्तर भारत में जन-जन की भाषा थी, इसमें संस्कृत शब्दावली को सहज रूप से आत्मसात करने की क्षमता थी और राष्ट्रीय एकता के लिए हिन्दी सबसे उपयुक्त सेतु बन सकती थी।
आर्य समाज ने शिक्षा को समाज-सुधार का सबसे प्रभावी साधन माना। 1886 में लाहौर में दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना हुई। इसके बाद देशभर में डीएवी स्कूल-कॉलेजों का जाल फैल गया। इन संस्थानों में अंग्रेज़ी शिक्षा के साथ-साथ हिन्दी और संस्कृत को विशेष महत्त्व दिया गया। आर्य समाज के गुरुकुल कांगड़ी (हरिद्वार, 1902) जैसे संस्थान पूरी तरह हिन्दी और संस्कृत माध्यम से शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रसिद्ध हुए। इससे हिन्दी को शैक्षणिक प्रतिष्ठा मिली और यह उच्च शिक्षा की भाषा के रूप में उभरने लगी।
हिन्दी पत्रकारिता के विकास में भी आर्य समाज का योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहा। ‘आर्यपत्र’, ‘सत्यधर्म’, ‘दयानन्द सरस्वती पत्रिका’, ‘भारत मित्र’ जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से आर्य समाज ने न केवल अपने विचारों का प्रचार किया, बल्कि हिन्दी गद्य को भी समृद्ध किया। इन पत्रों ने समाज-सुधार, राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना को हिन्दी में अभिव्यक्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में इस आन्दोलन ने हिन्दी को विचार-विमर्श और आंदोलन की भाषा बनाया।
आर्य समाज का स्वाधीनता आंदोलन से गहरा संबंध रहा। समाज ने अंग्रेज़ी सत्ता के विरोध में भारतीय संस्कृति और भाषा को मज़बूत किया। महर्षि दयानन्द का नारा “भारत भारतियों के लिए” राजनीतिक स्वाधीनता का आधार बना। स्वतंत्रता सेनानियों जैसे लाला लाजपत राय, स्वामी श्रद्धानन्द, पंडित गुरुदत्त विद्यालंकार, पंडित लेखराम आदि ने हिन्दी का प्रयोग कर राष्ट्रवाद को बल दिया। उनके भाषणों और लेखों में हिन्दी ही जनता को प्रेरित करने का माध्यम बनी।
आर्य समाज के विचारों ने हिन्दी साहित्य को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। गद्य साहित्य में तर्कप्रधान और संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का प्रयोग बढ़ा। कविता में राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक सुधार की लहर आई। भारतेंदु हरिश्चन्द्र, प्रताप नारायण मिश्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे लेखकों ने आर्य समाज से प्रभावित होकर हिन्दी को आधुनिक दिशा दी। नाटक और निबंध लेखन में भी आर्य समाज की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।
हिन्दी को राजभाषा बनाने के आन्दोलन में भी आर्य समाजी कार्यकर्ताओं ने बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने हिन्दी को हिन्दुस्तान की आत्मा बताया। हिन्दी को जन-जन तक पहुँचाने के लिए सभा-समितियाँ बनाईं। हिंदी को उर्दू और अंग्रेज़ी के दबाव से बचाने का प्रयास किया।
हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली जैसे क्षेत्रों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आर्य समाज ने विशेष योगदान दिया। गुरुकुल कांगड़ी, डीएवी कॉलेज, और अनेक आर्य कन्या पाठशालाएँ हिन्दी शिक्षा के केन्द्र बने। ग्रामीण क्षेत्रों तक हिन्दी साहित्य और शिक्षा को पहुँचाने का श्रेय भी आर्य समाज को जाता है।
आचार्य शीलक राम जैसे आधुनिक चिन्तक भी मानते हैं कि आर्य समाज ने हिन्दी को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाने में क्रांतिकारी कार्य किया। उनका कहना है कि — “आर्य समाज ने वेदों की व्याख्या हिन्दी में प्रस्तुत करके इसे जनसाधारण की भाषा बनाया। यदि आर्य समाज हिन्दी को प्रचार का माध्यम न बनाता तो सम्भवतः हिन्दी राष्ट्रीय आंदोलन की धुरी न बन पाती।”
आर्य समाज केवल एक धार्मिक-सामाजिक सुधार आन्दोलन नहीं था, बल्कि यह हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास का भी महत्त्वपूर्ण अध्याय है। महर्षि दयानन्द की भाषा-दृष्टि, आर्य समाज के शैक्षणिक संस्थान, हिन्दी पत्रकारिता में उनका योगदान, स्वतंत्रता आंदोलन के लिए हिन्दी को अपनाना — इन सबने हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की नींव रखी। आज जब हिन्दी को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने की बात हो रही है, तो आर्य समाज का यह योगदान और भी प्रेरणादायी बन जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि अपनी मातृभाषा के बिना कोई भी राष्ट्र अपनी अस्मिता को सुरक्षित नहीं रख सकता। इसलिए हिन्दी का संरक्षण और संवर्धन हम सबका कर्तव्य है।
डॉ सुरेश जांगडा
राजकीय महाविद्यालय सांपला, रोहतक (हरियाणा)