नवरात्रि: आत्मजागरण, प्रकृति-संतुलन और चेतना का पर्व
नवरात्रि: आत्मजागरण, प्रकृति-संतुलन और चेतना का पर्व
भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी पर्व केवल धार्मिक आयोजन मात्र नहीं होते, बल्कि वे जीवन, प्रकृति, शरीर और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने के उपाय होते हैं। इन्हीं पर्वों में एक विशेष स्थान रखता है नवरात्रि, जो न केवल देवी आराधना का समय है, बल्कि शारीरिक शुद्धिकरण, मानसिक स्थिरता और आत्मिक जागरण का अनुपम अवसर भी है।
नवरात्रि का समय हर बार ऋतु परिवर्तन के साथ आता है — जब प्रकृति नए रूप में बदल रही होती है, तब हमारा शरीर भी आंतरिक स्तर पर बदलाव के दौर से गुजरता है। इस समय यदि हम सात्त्विक आहार, संयमित दिनचर्या और उपवास का पालन करें, तो यह शरीर से विषाक्तता को निकालने और रोगों से बचाव का प्रभावी उपाय बन सकता है।
‘उपवास’ का वास्तविक अर्थ है — ‘स्व के समीप वास’। लेकिन आज यह केवल एक भोजन सूची का विकल्प बनकर रह गया है। फल, मिठाई, पकवान, और तथाकथित ‘उपवास खाद्य’ को ठूंस-ठूंसकर खाना उपवास नहीं है। असल उपवास है — इंद्रियों का संयम, मन की एकाग्रता, और चेतना को भीतर की ओर मोड़ना।
आज नवरात्रि सहित अधिकतर पर्व केवल कर्मकांडों और बाह्य आडंबरों तक सीमित हो गए हैं। पंडितों-पुजारियों और व्यापारिक वर्ग ने इन्हें धार्मिक उपभोक्तावाद का रूप दे दिया है। जबकि सनातन धर्म का संदेश है — धर्म की आत्मा आचरण में बसती है। बिना जीवन में उतारे गए अनुष्ठान केवल दिखावा बनकर रह जाते हैं।
सनातन धर्म कहता है कि व्यक्ति और ब्रह्मांड में कोई भेद नहीं। हमारे कर्मों की प्रतिध्वनि ब्रह्मांड तक जाती है और ब्रह्मांड के परिवर्तन हमारे शरीर और मन को प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि हमारे त्योहार भी प्राकृतिक घटनाओं और ऊर्जा चक्रों से जुड़कर मनाए जाते हैं।
आज आवश्यकता है कि हम नवरात्रि जैसे पर्वों के पीछे छिपे गहरे संदेशों को समझें और उन्हें अपने व्यवहार में उतारें। यह केवल देवी की मूर्ति पूजने का पर्व नहीं है, बल्कि अपने भीतर की देवी शक्ति को जागृत करने का निमंत्रण है।
आज युवाओं द्वारा इस पर्व को उपहास और फैशन शो बना देना हमारी संस्कृति के लिए एक चेतावनी है। यदि समय रहते सतर्कता और आत्मचिंतन न किया गया, तो सनातन मूल्यों की जड़ें कमजोर होती जाएँगी।
नवरात्रि एक अवसर है — भीतर उतरने का, स्वयं से जुड़ने का, और समग्र अस्तित्व से सामंजस्य स्थापित करने का। यदि हम इस पर्व को केवल अनुष्ठानों तक सीमित न रखकर, इसके अंतर्निहित आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्य को समझकर जीवन में उतारें, तभी यह पर्व हमारे जीवन, समाज और पर्यावरण के लिए सार्थक और कल्याणकारी सिद्ध हो सकता है।
डॉ सुरेश जांगडा
राजकीय महाविद्यालय सांपला, रोहतक (हरियाणा)