आचरण में मूलभूत सुधार हुये बिना काउंसलिंग व्यर्थ है
आचरण में मूलभूत सुधार हुये बिना काउंसलिंग व्यर्थ है
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भारतीय ऋषियों ने व्यक्ति के सुधार और परिष्कार का जो आचरण बतलाया है, वह सर्वश्रेष्ठ है। शंकराचार्य ने आज से 2500 वर्षों पहले श्रवण,मनन, निदिध्यासन कहकर इसको स्पष्ट किया है। यह ध्यान रहे कि जिस तरह से भारतीय दर्शनशास्त्र के शिक्षक,विचारक और काउंसलर इसको केवल सुकरतीय संवाद की विधि की तरह से एक संवाद की विधि मानकर चल रहे हैं,यह उनकी बहुत बड़ी महाभूल है। ऋषियों की इस पुरातन विधि के साथ योगाभ्यास जुड़ा हुआ है।यह केवल बौद्धिक या वैचारिक चिंतन या कोई विमर्श नहीं है।यह होश, जागरण, जागरुकता, अवेयरनेस,द्रष्टाभाव से आगे साक्षीभाव तथा ज्ञानयोग है।श्रवण का आशय केवल सामान्य सुनना न होकर जिन् महावीर की भाषा में श्रावक होना है, जिसमें श्रवण करते समय केवल श्रवण करना है। श्रावक का 100 प्रतिशत मन सुनने में ही रत रहना आवश्यक होता है। जबकि सामान्य सुनने में मन दो हिस्सों में विभाजित रहता है – एक सुनने वाला तथा दूसरा सुनते समय भी साथ में चिंतन भी करते जाना।यह श्रवण नहीं है। श्रवण में तो मन हिस्सों में विभाजित नहीं होकर समग्र रूप से बस सुनता है।जब इस तरह से सुनना संपन्न होता है, उसके पश्चात् उस पर मनन करना।जब समग्र मन से सुनना ही नहीं हुआ तो फिर मनन कहां से और कैसे होगा? पाश्चात्य शैली की शिक्षा में और भारतीय शैली की शिक्षा में यह बहुत बड़ा अंतर है।सुनो और फिर मनन करो। सुनना और मनन करना एक साथ नहीं हो सकता है। यदि यह करने की कोशिश की तो सुनना और मनन करना दोनों ही अधूरे रहेंगे।
आजकल जिद्दू कृष्णमूर्ति और आचार्य रजनीश ने इस कला पर बेहतरीन तरीके से प्रकाश डाला है। ‘उपनिषद्’ शब्द से भी इसी कला का निहितार्थ प्रकट होता है। बृहदारण्क उपनिषद्,(2/4/5) के ऋषि याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयि से कहा भी है – ‘आत्मा वा रे द्रष्टव्य: श्रोतव्यो मंतव्यो निधिध्यासितव्य: मैत्रेयि’।।
इसमें ऋषि कहते हैं कि आत्मानुसंधान में अनुभूतिसंपन्न ऋषियों के उपदेश का श्रवण,मनन और निदिध्यासन करके ही शिष्य आत्मानुभूति को उपलब्ध होता है। आजकल शुष्क बौद्धिक तर्क- वितर्क की प्रधानता के कारण न तो श्रवण हो पा रहा है,न मनन तथा निदिध्यासन यानी योगाभ्यास के द्वारा आत्मानुभूति तो बहुत दूर की बात हो गई है।बस मन यानी विचार के तल पर ही रहकर मानसिक समस्याओं का समाधान करने की जद्दोजहद चल रही है। इससे समस्या और भी अधिक विकट हो गई है।
विभिन्न धर्माचार्यों के सत्संगों, कथाओं, प्रवचनों, व्याख्यानों में न पूरी तरह से सुनते हैं,न मनन करते हैं तथा न ही निदिध्यासन करते हैं।इसलिये इनका जनमानस पर कोई सृजनात्मक प्रभाव भी नहीं पड़ रहा है।बस अनुयायियों की भीड़ एकत्र होती है और सम्मोहितों की तरह गर्दन हिलाकर पल्ला झाड़ते हुये वापस अपने घरों को लौट आती है। अन्यथा सत्संगों, कथाओं, प्रवचनों और व्याख्यानों में इतनी भीड़ होने पर लोगों में और संसार में परस्पर समझ, विवेक,होश, जागरण, भाईचारे, सद्भाव,प्रेम और करुणा की मूसलाधार वर्षा हो जाती।
काउंसलिंग अपनी या किसी अन्य की भंडास निकालना या रेचन करना या कैथार्सिस करके हल्का होना मात्र नहीं है।यह काउंसलिंग के प्रति गलत सोच और मानसिकता है।आज अपनी भंडास निकाल लोगे तो कल तक फिर से अपने आपको तनाव,चिंता, हताशा से भरा हुआ पाओगे। ऐसे में तो जीवन नारकीय बनता जायेगा। काउंसलिंग की यह कोई सही तकनीक नहीं है। सभी काउंसलर गलती यही पर करते आये हैं,वो काउंसलिंग व्यक्ति की नहीं करते अपितु तनाव,चिंता,हताशा आदि की करते हैं।मूल तक जाते ही नहीं हैं।जिसको तनाव,चिंता, हताशा आदि होते हैं,उसका ख्याल ही नहीं है।इनकी दिक्कत यह है कि ये जिसको तनाव,चिंता, हताशा आदि होते हैं,उसकी सत्ता को मानते ही नहीं हैं।इसी मूढ़ता की वजह से इनकी फिलासफिकल, साइकोलॉजिकल,मोरल काउंसलिंग सिर्फ हवा में चलती है।
अमर उजाला समाचार- पत्र( दिनांक 16/09/25) में अकेलेपन से उत्पन्न समस्याओं के संबंध में कुमार सिद्धार्थ का एक आलेख पढ रहा था। दुनिया में हो रहे नवीन शोध से यह स्पष्ट है कि आजकल व्यक्तियों में बढती जा रही तनाव,हताशा,कुंठा,आत्महत्या और घुटन की समस्यायों का मुख्य कारण ‘अकेलापन’ है। पाश्चात्य शैली की जीवनचर्या के प्रति से उपजे स्वार्थ,लालच ,भोग की उन्मुक्त कामनाओं को पूरा करने के लिये लोग अपने माता पिता,परिवार,समाज, मित्रों से टूटकर अलग रहना पसंद करते हैं। लेकिन एक सीमा पर जाकर इनमें पत्नी या पति में परस्पर अनबन होकर बोलचाल तक बंद हो जाती है और अकेलापन शुरू हो जाता है। मित्रों और माता -पिता का साथ पहले ही छूट चुका होता है। पति, पत्नी, भाई,माता, पिता, मित्र सभी अकेले हो जाते हैं।ईगो इतना प्रबल होता है कि किसी को झुकने भी नहीं देता है।इस तरह से इस अकेलेपन से तंग आकर लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं। दुनिया में अकेलेपन से परेशान होकर आत्महत्या करने वालों की संख्या लाखों में है।इस मानसिक बिमारी की क्या चिकित्सा या काउंसलिंग या हीलिंग हो सकती है? स्वार्थ,लालच और उन्मुक्त भोग के कारण जीवनमूल्यों से किनारा कर लिया गया है।जब रिश्ते नातों को भी उपयोगिता,लाभ और स्वार्थ के तराजू में तोलना जारी रहेगा तो इस अकेलेपन की समस्या का कोई समाधान नहीं है। अपने,घर, परिवार, भाई,बहन, माता,पिता, मित्र,पडौसी ,गुरुजन को छोड़कर क्या पत्थरों से बातें करोगे?कुछ सृजनात्मक नहीं होनेवाला। कोई काउंसलर इस बिमारी को ठीक करके तो बतलाये।आश्वासन देना कोई चिकित्सा या काउंसलिंग या हीलिंग नहीं है।यह तो सिर्फ एक व्यवसाय है।यह सिर्फ एक आजीविका ह।
मेरा एक साथी विनोद विनोद कर रहा था कि जब तक इच्छाएं है, तब तक जीवन है।इच्छाएं खतम तो जिंदगी की उल्टी गिनती शुरूहो जाती है।
इसलिये इच्छाओं को हमेशा जीवित रखिये।आज नहीं तो कल पूरी होने की उम्मीद रखिये ।यही सत्य की खोज है।यही जीवन का सत्य है। मैं इस सत्य से पूरी तरह सहमत हूं।यह विनोद नहीं बल्कि वास्तविकता है।यही जीवन की हकीकत है।इसे कोई भी झूठला नहीं सकता है। सिद्धार्थ गौतम ने इच्छा, तृष्णा, कामना आदि को समाप्त करने की जो सीख दी है,वह मूढतापूर्ण है। उसमें कोई सार नहीं है।ऐसी बकवास शिक्षाओं से दूर रहने में ही भलाई है।
धम्मपद 98,अरहंतवग्ग में कहा गया है -‘गामे वा यदि वार ञ्ञे निन्ने वा यदि वा थले।
यत्थ अरहंतो विहरंति,तं भूमिरामणेय्यकं।। अर्थात् जिस भूमि पर अरिहंत गुजरता है,वह भूमि रमणीय हो जाती है, पवित्र हो जाती है।अब देखिए कि यह बात कितनी बेवकूफी से भरी हुई है। किसी व्यक्ति के कहीं से गुजरने से कोई जगह कैसे पवित्र हो सकती है?जब आप कर्मों से सब कुछ संभव मानते हो तो किसी के कहीं पर चलने मात्र से पवित्रता का दुष्प्रचार क्यों करते हो?यह कोरा पाखंड है।यह वैसा ही पाखंड है जिस तरह के पाखंड का खंडन स्वयं सिद्धार्थ गौतम ने अपने समय पर किया था।आज बौद्ध मत में वो सारे पाखंड, ढोंग और शोषण करने के तरीके सौ गुना बेहुदडगी से मौजूद हैं,जिनका खंडन उन्होंने हजारों वर्षों पहले किया था। यदि आप वास्तव में ही सिद्धार्थ गौतम को मानते जानते हो तो बौद्ध मत के इन पाखंड, ढोंग और शोषण का विरोध करो। लेकिन नहीं करेंगे क्योंकि दुकानदारी बंद हो जायेगी।
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आचार्य शीलक राम
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र- 136119