बातें जो अधूरी रह गईं
क्लास खत्म होने के बाद, सिया और आरव स्कूल के गार्डन में बैठ गए।
हवा में वही पुरानी मिठास थी।
सिया बोली —
“सोचा नहीं था हम फिर मिलेंगे…”
आरव हल्के से मुस्कुराया —
“मैंने तो हर दिन यही सोचा था…”
सिया की आँखों में आँसू थे —
“तुम नाराज़ तो नहीं?”
आरव बोला —
“नाराज़? नहीं… बस किस्मत से थोड़ा ग़मगीन ज़रूर हूँ।”
सिया ने कहा —
“ज़िंदगी ने बहुत कुछ दिया, पर सुकून नहीं…”
आरव बोला —
“और मुझे सुकून मिला, पर ज़िंदगी नहीं।”
दोनों हँस दिए — दर्द भरी हँसी, जो रोने से ज़्यादा चुभती है।