वो पल जब वक़्त रुक गया
पैरेंट्स मीटिंग का दिन आया।
स्कूल के गेट पर आरव खड़ा था।
सामने से एक औरत आई — सादी साड़ी में, सादगी से भरी…
वो सिया थी।
उसकी चाल में वही ठहराव, आँखों में वही गहराई,
बस चेहरा अब वक्त की रेखाओं से भरा था।
आरव कुछ कदम पीछे हट गया,
उसकी आँखों में वही पुराना बरगद झलक गया।
सिया भी ठिठक गई —
“आरव…? तुम?”
आरव की आवाज़ कांपी —
“हाँ सिया… मैं अभी भी वहीं हूँ… जहाँ तुम छोड़कर गई थी…”
दोनों कुछ पल तक चुप रहे।
वक़्त जैसे रुक गया था।