ख़त जो कभी पहुँचे नहीं
एक दिन सिया ने अपने दर्द को कागज़ पर उतार दिया।
उसने लिखा —
“आरव, मैं ठीक हूँ… पर तेरा नाम अब भी मेरी सांसों में है।
तू सही था, सुकून वहीं होता है जहाँ दिल सच्चा हो… और मेरा दिल तो आज भी वहीं है।”
उसने वो ख़त डाक में डालने की कोशिश की,
पर फिर रुक गई।
वो मुस्कुरा दी और बोली —
“अगर किस्मत में मिलना लिखा है, तो ख़त नहीं, खुद पहुँच जाएगा।”
दूसरी ओर, उसी रात आरव ने भी अपनी डायरी में लिखा —
“सिया, तेरी यादों ने मुझे इंसान बनाए रखा है।
आज भी जब बच्चों को ‘सच्चे प्यार’ की कहानी सुनाता हूँ,
तो हर चेहरा तू बन जाती है।”