शहर की ज़िंदगी
आरव अब शहर में एक छोटे से स्कूल में अध्यापक था।
रोज़ बच्चों को पढ़ाता, मुस्कुराता, पर अंदर से टूटा हुआ था।
कभी-कभी जब किसी बच्चे की आँखों में सच्चाई दिखती, तो उसे सिया याद आ जाती।
वो खुद से कहता —
“कमाल है, सिया को भूलने आया था… और अब उसी की यादों में जी रहा हूँ।”
शाम को घर लौटते वक्त वो नदी किनारे बैठता,
और सिया की आख़िरी मुस्कान को याद करता —
वही मुस्कान जो उसकी दुनिया थी।