बढ़ेचलो
तूणक छंद:- वार्णिक
गणावली:-
राजभा जभान राजभा जभान राजभा,
212 121 212 121 212
लक्ष्य से डिगो नहीं बढ़े चलो बढ़े चलो।
चोटियां पहाड़ की चढ़े चलो चढ़े चलो।।
सोच जागती रहे समाज के विषाण की।
धार तीव्र ही रहे सुलक्ष्य के कृपाण की।।
सोचले विचार ले विलंब को बिसार दे।
काल पे सवार हो भविष्य को निखार दे।।
हो युवा प्रवाह से बहो स्वतंत्र रूप से।
ताप में तपो सदैव भागना न धूपसे।।
व्योम में उड़े चलो जमीन को न भूलना।
साख साख नाप लो उमंग धार झूलना।।
राह में मिली अनेक मुश्किलें जहाँ कहीं।
रोकना नहीं सुधीर चाल ढाल को वहीं।।
जीत तो तभी मिले प्रयास से चले चलो।
हार को लगा गले समान रूप से मिलो।।
होसला बुलंद हो हुईं करीब मंजिलें।
जोश होश वार हो पहाड़ भी तभी हिलें।।