न सुकून मिलता, न ज़रूरतें मुकम्मल होती हैं,
न सुकून मिलता, न ज़रूरतें मुकम्मल होती हैं,
ज़िंदगी की अदालत में हर ख़्वाहिश वहीं क़ैद होती है
जहाँ हक़ीक़त और दर्द की तौहीन नहीं होती।
न सुकून मिलता, न ज़रूरतें मुकम्मल होती हैं,
ज़िंदगी की अदालत में हर ख़्वाहिश वहीं क़ैद होती है
जहाँ हक़ीक़त और दर्द की तौहीन नहीं होती।