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8 Nov 2025 · 1 min read

न सुकून मिलता, न ज़रूरतें मुकम्मल होती हैं,

न सुकून मिलता, न ज़रूरतें मुकम्मल होती हैं,
ज़िंदगी की अदालत में हर ख़्वाहिश वहीं क़ैद होती है
जहाँ हक़ीक़त और दर्द की तौहीन नहीं होती।

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