ध्येय गगन
///ध्येय गगन///
मुक्त गगन के उड़ते पंछी,
कर अपना गति भान जरा।
अंकित पथ के प्राप्य लक्ष्य ,
देख तेरे निष्ठा अनुमान जरा।।
अंतरिक्ष की अंत:गति पर,
तेरा क्या लक्षित प्रतिमान।
गति रेखा के अंकित पट का,
क्यों अब तक है अभिमान ।।
तेरे गति पथ का आरेख,
नहीं मिला आकाश में अंकन।
जान सकेगा तू कैसे तब,
अपने पालित भावों का स्कंदन।।
अमृत की मधुता ने तुझमें,
जगाए कौन से प्रेरित स्पंदन।
वायु के झोंकों का स्पर्शन,
सदा देते थे अपना अवलंबन।।
मन प्रेरित आत्म ज्वाल से,
जिस मारग को तूने गहा है।
किस आशा से प्रति प्रेरित ,
विस्फारित दृग से देख रहा है।।
जग के संघर्षों के नियमन का,
भरा नहीं तुझ में कोई भार।
क्यों पीड़ाधर आनंद भाव पर,
नहीं उठा उसका प्रतिकार।।
जीवन की नौकायें लेकर,
बढ़ना नित्य निरंतर आगे।
टटोल रहा केवल पथ को,
जो अब तक तुझ में जागे।।
मिल न सकेगा हेतु पुरस्सर,
आत्मबोध देता मन का दर्पण।
झूल न सकेगा उस झूले पर,
जो होंगे हित साधन संकर्षण।।
चलित फलित अवलोक शशि,
रहा सदा तू निद्रातुर होकर।
न पाया ध्येय अनंत गगन का,
अपने ही भाव गति में खोकर।।
स्वरचित मौलिक रचना
रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)