अनुरक्ति_नहीं_तब_तक_पूरित, जब-तक अनुरागी बहा नहीं !!
तू गंगा घाट बनारस सी, मैं मुक्ति पंथ का पथिक प्रिये!
यदि वासंतिक मधुमास है तू, मैं राग-रंग का रसिक प्रिये!!
मैं पातक दीन दुराचारी,
पर प्रीति राग का अनुगामी।
तन-मन से साधक मै तेरा,
पर कहते हैं सब खलकामी।
अब दर्शन हो इन नैनन को,अभिलाष नहीं कुछ अधिक प्रिये!
तू गंगा घाट बनारस सी, मैं मुक्ति पंथ का पथिक प्रिये!।
तू स्वाति बूंँद मैं चातक हूँ,
यह युगों-युगों का है बन्धन।
तुम हो तो मोद- प्रमोद सकल,
तुम बिन जीवन यह है क्रन्दन।
मैं मृत्यु वरण को भी आतुर, जो बनो अगर तुम वधिक प्रिये!
तू गंगा घाट बनारस सी, मैं मुक्ति पंथ का पथिक प्रिये!!
संगम तेरा मेरा होगा,
यह आस लिए मैं भटक रहा।
इकतरफा प्रेम लिए कबतक,
मैं चलूं भला बस खटक रहा।
मन मेरा प्रेम नगर प्यारा, जिसके केवल तुम कटिक प्रिये!
तू गंगा घाट बनारस सी, मैं मुक्ति पंथ का पथिक प्रिये!!
तन-मन-धन मेरा सब तेरा,
मुझमें मेरा कुछ रहा नहीं
अनुरक्ति नहीं तब तक पूरित,
जब-तक अनुरागी बहा नहीं।
मैं कण्ठहार का तन्तु बनूं, तुम बनो अगर स्फटिक प्रिये!!
तू गंगा घाट बनारस सी, मैं मुक्ति पंथ का पथिक प्रिये!!
अब संयम मन का टूट रहा,
इस चिर-प्रतीक्षित मिलन को आ।
आकर आलिङ्गन में भर ले,
आहत उर को अवलेप लगा।
स्वीकार करो विनती मेरी, उपकार करो जी तनिक प्रिये!
तू गंगा घाट बनारस सी, मैं मुक्ति पंथ का पथिक प्रिये!!
✍️ संजीव शुक्ल ‘सचिन’ (नादान)
मुसहरवा (मंशानगर)
पश्चिमी चम्पारण, बिहार