रात होने को है
रात होने को है अब,चलो दीया जलाएं।
अंधेरों से डर कैसा,चलो इसे भगाएं
रात के आंचल में, टिमटिमाते हैं तारे
जैसे अपने मन में , ढ़ेरों अरमां प्यारे।
किताबों का दामन थामें, नया कुछ करें
अपने दम पर आगे बढ़े,किसी से न डरें।
अज्ञानता को छोड़कर आगे बढ़ना सीख
मेहनत से फल मिले,देता न कोई भीख।
रात होने को है , इसमें डरने की न बात।
रात के सीने पर ही लिखा होता है प्रभात।
सुरिंदर कौर