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6 Nov 2025 · 3 min read

सकल सृष्टि के नाथ

जनक सुता भ्राता लखन,को लेकर निज संग।
चले विपिन प्रभु राम हैं,छोड़ राजसी ढंग।।

पीत वसन तन धार कर,धनुष बाण ले हाथ।
वेश धार तपसी चले,सकल सृष्टि के नाथ।।

मात-पिता के छू चरण,झुका गुरू को शीश।
पित आज्ञा सिर धार वन,चले कोशलाधीश।।

राजपाट सब त्याग कर, हरने जग की पीर।
पाप मिटाने धरा से, चले विपिन रणधीर।।

श्रृंगवेरपुर धाम में,गंगा जी के तीर।
प्रभु केवट जी से मिले,ले नयनों में नीर।।

भारद्वाज ऋषि की कुटी,आए सीता राम।
नवा शीश ऋषि के चरण,सादर किया प्रणाम।।

विश्वामित्र के साथ में,आए गौतम धाम।
सुनी अहिल्या की कथा,निकट गए प्रभु राम।।

छूते ही पग राम के,तरी अहिल्या नारि।
पत्थर से वह हो गई, पुनः नारी सुकुमारि।।

राजा निषादराज से, मिले सियापति राम।
निषाद जी ने राम की,सेवा की निष्काम।।

निषाद जी से ले विदा,आगे बढ़ श्रीराम।
आ पहुँचे ऋषि की कुटी, वाल्मीकि के धाम।।

अनसूया अत्रि की कुटी, कुछ दिन किया निवास।
दंडक वन शरभंग ऋषि,करी भेंट फिर खास।।

साधु सुतीक्ष्ण की कुटी, जब पहुँचे श्रीराम।
पता अगस्त्य का बता,भेजा गुरु के धाम।।

दर्शन देने राम जी,पहुँचे शबरी द्वार।
मतंग चेली के किए,सकल स्वप्न साकार।।

माँ शबरी के हाथ से,खाए जूँठे बेर।
भील जाति की नारि को,दे दीं खुशियाँ ढेर।।

मिले भक्त हनुमान से,जाकर तब भगवान।
ऋष्यमूक गिरि पे लगा,बैठे थे जो ध्यान।।

बड़े दिनों के बाद में,मिले भक्त भगवान।
सीने से प्रभु राम को,लगा लिए हनुमान।।

सुग्रीव जी से बंधुता,करवाई हनुमान।
जिनका बाली भ्रात था, परमवीर बलवान।।

जिसने छल से भ्रात की,नारी ली थी छीन।
समझ रखा था भ्रात को, बिल्कुल निर्बल दीन।।

सात साल की ओट से,मारा प्रभु ने बाण।
एक तीर के वार से,तन से निकले प्राण।।

राजा सुग्रीव को बना,अंगद को युवराज।
सिया खोजने राम फिर,निकले सेना साज।।

खोज सिया करते मिले,घायल पड़े जटायु।
सीता का बतला पता, खत्म हो गई आयु।।

जटायु का प्रभु राम ने,किया दाह संस्कार।
जैसे करता है तनय,पित आदर सत्कार।।

बानर सेना संग ले, पहुँचे सागर तीर।
सेतुबंध की स्थापना,किए धीर गंभीर।।

विनय पूर्वक राम ने,सागर माँगी राह।
किन्तु जलधि के थी हृदय,हठ करने की चाह।।

तीन दिवस के बीतते,रूठे कृपानिधान।
सागर पर होके कुपित, खींचा तीर कमान।।

देख क्रोध प्रभु राम का,उदधि हुए भयभीत।
क्षमा करें रघुवंशमणि, मैं पापी अति नीच।।

दो भाई नल नील हैं,सेना में रघुनाथ।
जल में पत्थर तैरते,उन दोनों के हाथ।।

सेतु सिन्धु निर्माण कर,लंका जाओ आप।
लंकापति को मारकर,हर लो जन संताप।।

बानर सेना के सहित, उतरे सागर पार।
दुष्ट दशानन मारने, दीनबंधु करतार।।

भक्त विभीषण से मिले,जग के पालनहार।
सखा विभीषण को बना,पहनाया गल हार।।

एक एक कर राम ने,मारे लंका वीर।
ढह धीरे-धीरे गई,लंका की प्राचीर।।

अंत दशानन राम से, करने आया युद्ध।
छोड़ दिए बहु तीर हैं,हो रघुवर पर क्रुद्ध।।

लगा निशाना नाभि पर,कसकर मारा बाण।
हरे एक ही वार में,दशकंधर के प्राण।।

अंत हुआ अभिमान का,हुई सत्य की जीत।
गूँज उठे चहुँओर हैं,राम विजय के गीत।।

सिया लखन को संग ले,घर आए श्रीराम।
दर्शन को आए सभी,छोड-छाड़ निज काम।।

दीपक खुशियों के जले,सजा अवधपुर धाम।
गूँज रहा चहुँओर बस,सिया राम का नाम।।

सकल सृष्टि की चेतना,नर जीवन आधार।
सत्य सनातन के रक्षक,श्री हरि के अवतार।।

स्वरचित रचना-राम जी तिवारी”राम”
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)

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