” दुमका में प्रभात फेरी का दौर “
दुमका दर्शन
(संस्मरण)
डॉ लक्ष्मण झा परिमल
====================
जब ये सारे आधुनिक उपकरण नहीं होते थे, यहाँ तक कि हमारे पास लोडस्पीकर प्रयत्न करने के बाबजूद भी नहीं मिल पाते थे ! परिवर्तन और क्रांति लाने के लिए ‘प्रभात फेरी ‘ ही हमारा अस्त्र रहा ! हम सुबह ३ बजे कहीं एक जगह एकत्रित होते थे और गाँव वाले गांवों में ,कस्बे वाले कस्बों में ,शहर वाले शहरों में और इस तरह सम्पूर्ण देश में हम अलख जगाने का काम करते थे ! घर -घर अपनी योजनाओं का प्रचार- प्रसार करते थे ! स्वतंत्रता आन्दोलन के समय भी हमारे राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी जी ने भी इसे अपनाया था ! हम सोये को जागते थे और उनमें उर्जा का संचार करते थे ! राष्ट्रीय गान ,देश भक्ति गीत और हमारा उद्देश्य भरा स्वर घर- घर हम पहुँचाते थे !
मुझे याद है कि दुमका के ” स्वतंत्रता क्रांति के सिंह पुरुष पंडित दशरथ झा “के नेतृत्व में 1958 से ही प्रभातफेरी की गूँज मुझे सुनाई देने लगी ! हालाँकि इस प्रभातफेरी का इतिहास पुराना ही रहा होगा ! मानो प्रभातफेरी स्वतन्त्रता दिवस 15 अगस्त के प्रारम्भिक प्रक्रिया हो गयी थी ! बच्चे, बूढ़े और बुजुर्ग सभी उत्साह से भाग लेते थे ! तिरंगा झण्डा सभी के हाथों में रहता था ! सबके सब 3 बजे सुबह दुमका के धर्मस्थान में एकत्रित हो जाते थे ! सब लोग इंतजार करते थे उस महान गायक को जो अपने एकतारा बजाकर स्वयं गाते भी थे ! उनका नाम श्री अकलु सिंह था !
श्री अकलु सिंह रहते तो थे कुम्हारपाड़ा मस्जिद और हनुमान मंदिर के बीच मैन रोड पर ! उनकी अपनी दुकान ठीक धर्मस्थान के उत्तर सड़क के साथ सटी थी ! श्री अकलु सिंह की दुकान को उनका जेष्ठ पुत्र भूदेव चलाते थे ! अकलु सिंह के एक हाथ में एकतारा होता था और दूसरे हाथ में झपताल ! वे लाल वस्त्र पहनते थे ! उनकी साधारण भेष -भूषा होती थी , पर भजन -कीर्तन में उन्होंने महारथ हासिल कर रखा था ! उनके आने से लोगों में एक नवीन ऊर्जा की संचालन होती थी !
सर्वप्रथम हमलोग मास्टर दुकान की चाय पीते थे , और बंदेमातरम नारों के साथ प्रभातफेरी सारे नगर का भ्रमण करती थी ! हरेक मुहल्ले से लोग और सक्रिय हो जाते थे ! शिवपहाड़ से स्वतन्त्रता सैनानी श्री गोवर्धन दुबे का साथ मिल जाता था ! बांधपाड़ा से स्वतन्त्रता सैनानी श्री सर्वानंद मिश्रा का सानिध्य प्राप्त हो जाता था ! दुमका में प्रभातफेरी का मानो सैलाब उमड़ पड़ता था ! घर से बाहर लोग उठ कर हमलोगों का अभिनंदन करते थे !
लोगों में यह सदेश पहुँचता था कि हमारी एकता और भाईचारा ने हमें अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ा ! ठीक सुबह 7 बजे प्रभातफेरि का समापन धर्मस्थान में ही होता था ! ” स्वतंत्रता क्रांति के सिंह पुरुष पंडित दशरथ झा समापन की उद्घोषणा करते थे और सबको अपना आभार व्यक्त करते थे ! लोग मास्टर दुकान ,बालमुकुंद का घूघनी -मूढ़ी की दुकान ,बहिरा बंगाली का घूघनी -मूढ़ी की दुकान और भूदेव के दही-चुड़ा की दुकान में लोग नास्ता करते थे और फिर अपने- अपने घर पहुँचकर स्वतन्त्रता दिवस की तैयारी में लग जाते थे !
=====================
डॉ लक्ष्मण झा परिमल
साउंड हैल्थ क्लीनिक
एस 0 पी 0 कॉलेज रोड
दुमका
झारखंड
06.11.2025
This post has been self-published.