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6 Nov 2025 · 1 min read

उजले-उजले मन के बादल

गीत
उजले-उजले मन के बादल
कभी कभी काले दिखते
रात सुहागी कहे पूर्णिमा
रूप-रूप दर्पण सजते ।।

कौन यहां पर करे आचमन
हाथों में गंगा जल भर
दो बूंदों में सिमटा सागर
पापों की गठरी देकर
सुंदर तन की यह परिभाषा
गीत अलंकारी लगते ।।

राज-साज सीने में रखते
यहाँ प्रदूषित से चेहरे
तुलना करें चांद से अपनी
रंग, रूप के ये भँवरे
सिमटे सिमटे जग के मोती
पनघट पर आँसू भरते।।

एक सभी की गति है यारो
पूनम मावस आना जी
कभी ढका तो उजला चंदा
क्या यह बात बताना जी
शुक्ल-कृष्ण के पक्षाघाती
मन त्योहारी सब कहते ।।

सूर्यकांत
05.11.2025

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