Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
6 Nov 2025 · 1 min read

बदलोगे यकीनन

इश्क़ की खातिर ही पिघलोगे यक़ीनन
सोच अपनी आप बदलोगे यक़ीनन

कितने दिन ठुकरा सकोगे इश्क़ मेरा
हुस्न पे इक दिन तो फिसलोगे कंयक़ीनन

आंसुओ से ही भरा सुंदर जमाना
आ के पहलु में मेरे संभलोगे यक़ीनन

है घिरा संघर्ष ये कितने दिनों का
मुश्किलों को छोड़ निकलोगे यक़ीनन

बन कयामत आ गई जो बज्म़ में मैं
दिल ही दिल तुम भी तो मचलोगे यक़ीनन

हो गए पत्थर भले ही आज तुम तो
एक दिन तो खुद ही पिघलोगे यक़ीनन

मिल गईं जो खुद ब खुद इक दिन सुधा तो
बांकपन में अपने उछलोगे यक़ीनन

डा सुनीता सिंह सुधा ©®
5/11/2025
वाराणसी उत्तर प्रदेश 9671619238

Loading...