बदलोगे यकीनन
इश्क़ की खातिर ही पिघलोगे यक़ीनन
सोच अपनी आप बदलोगे यक़ीनन
कितने दिन ठुकरा सकोगे इश्क़ मेरा
हुस्न पे इक दिन तो फिसलोगे कंयक़ीनन
आंसुओ से ही भरा सुंदर जमाना
आ के पहलु में मेरे संभलोगे यक़ीनन
है घिरा संघर्ष ये कितने दिनों का
मुश्किलों को छोड़ निकलोगे यक़ीनन
बन कयामत आ गई जो बज्म़ में मैं
दिल ही दिल तुम भी तो मचलोगे यक़ीनन
हो गए पत्थर भले ही आज तुम तो
एक दिन तो खुद ही पिघलोगे यक़ीनन
मिल गईं जो खुद ब खुद इक दिन सुधा तो
बांकपन में अपने उछलोगे यक़ीनन
डा सुनीता सिंह सुधा ©®
5/11/2025
वाराणसी उत्तर प्रदेश 9671619238