मुक़द्दर दूर रक्खो
ताज़ा ग़ज़ल
मुकद्दर दूर रक्खो , अब हक़ीक़त को चुना जाए,
जो पूरा हो सके यारों , वही अरमाँ बुना जाए ।
मसर्रत की घड़ी पाकर ,खुशी से झूम उठते हैं ,
चलो महफ़िल पुकारे, गीत प्यारा सा सुना जाए।
गुनाहों से हुए लबरेज़ , डरते ही नहीं इंसाँ,
अगर दोज़ख़ से बचना है ,ज़मीं पर ही भुना जाए ।
नहीं करते हैं कोई काम, बस इक छेड़खानी है,
शरारत में डुबे लड़कों को ,अच्छे से धुना जाए।
तपिश सीने में हो,आँखों में बसती हो निगहबानी ,
कड़कती धूप के अंगार में , फिर से हुना जाए ।
फ़क़त इंसानियत ज़िन्दा करो ,अब तो सुधर जाओ,
करो माँ बाप की ख़िदमत , दुआओं में गुना जाए।
समझते जो नहीं , बरबाद हो जाते , ख़ुदी से ख़ुद,
मशक्कत नील की हमराह बन, गुलशन दुना जाए ।
✍️नीलोफर ख़ान नील रूहानी
शब्दार्थ _
ख़ुदी _ अहंकार
लबरेज़ _ भरा हुआ, दोज़ख़ _ नर्क