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6 Nov 2025 · 4 min read

योग्यता बनाम सहारा ( अंतिम क़िश्त )

योग्यता बनाम सहारा ( अंतिम क़िश्त )

अब तक– रमेश अब बेसब्री से उस दिन का इंतज़ार करने लगा जिस दिन बरहापुर सकूल में उसका सम्मान होने वाला था —

आगे–२ महीने कैसे गुज़र गए पता भी नहीं चला . उपरोक्त निर्धारित तारीख को रमेश जी सुबह से तैयार होकर दुर्ग से बरहापुर कि और चल पड़े। वे बरहापुर सीधे जाने के बदले अपने ग्राम दानी कोकड़ी चले गए . कोकड़ी में उन्हें कुछ ज़रूरी काम था । उनका गांव कोकड़ी धमधा से कुछ किलोमीटर पूर्व मुख्य मार्ग से ५ किमी अंदर स्थित था । अपने गांव से काम करके जब वे बरहापुर कि और रवाना होना चाहे तो उनकी गाड़ी का इंजन प्रारम्भ ही नहीं हुआ। कुछ विशेष खराबी आ गई थी।जिसे बनवाने में लगभग २ घंटे जाया हो गए ।अत: जब वे बरहापुर स्कूल प्रांगण पहुंचे तो १२ बज चुके थे और कार्यक्रम लगभग समाप्ति कि और था। उन्हें जैसे ही स्कूल के प्रिंसिपल ने देखा तो आगे बढकर उनका स्वागत किया और तुरंत ही मंच पर ले जाकर उनका सम्मान करवाया . इसके बाद उनसे अपनी भावना को व्यक्त करने कहा गया तो उन्होंने कुछ देर अपनी बात कही फिर वे मंच से उतर कर सबसे विदा लेकर वापस जाने लगे। तभी पंडाल के आखिरी दरवाजे से जब वे बाहर जा रहे थे उन्होंने देखा कि पंडाल के पहले दरवाजे से कलेक्टर महोदया प्रवेश कर रही हैं । ये देख उन्हें आश्चर्य हुआ कि आखिर भारती ठाकुर यहां क्यूँ आई है । इस स्कूल से क्या उनका भी कोई रिश्ता था। रमेश तेजी से बाहर निकल गए और कुछ दूर जाकर खड़े हो गए । उस स्थान पर संयोग से स्कूल के पूर्व प्राचार्य खड़े थे । तो उन्होंने प्राचार्य महोदय को नमस्कार करते हुए पूछा कि आखिर वर्त्तमान कलेक्टर महोदया यहां क्यूँ आई है ? तब जवाब में प्राचार्य महोदय ने बताया आप शायद जानते नहीं हैं कि कलेक्टर महोदया आज से ८/१० वर्ष पूर्व इसी स्कूल में प्रवेश लिया था। वह बेहद ही कुशाग्र बुद्धि की छात्रा थी। उनका पूरा नाम उस समय” माला भारती ठाकुर” था . पर अब न जाने क्यों वह अपने नाम में भारती ठाकुर ही लिखती थी। वह बरहापुर के इस स्कुल में सिर्फ ७/८ महीने ही रह पाई थी और उतने ही समय में ही अपनी बुद्धिमता का लोहा मनवा लिया था । लेकिन किसी राजनैतिक कारणों से उन्हें बिना सत्र के पूरा हुए ही स्कूल से निकाल दिया गया और किसी और जिले में जाने के लिए मजबूर किया गया । इसके बाद वे इस स्कूल को छोड़कर संभवता: बस्तर चली गई थी। जिसकी जानकारी हम लोगों को तो नहीं थी . पर जब बरहापुर स्कुल के इस कार्यक्रम कि तैयारी हो रही थी तब यहां के प्रतिनिधि मंडल किसी काम से उनसे मिलने उनके दफ्तर गया तो उनके मुख से ही पता चला कि वे भी बरहापुर स्कूल कि पूर्व छात्रा है। बस क्या था स्कूल द्वारा उनकी बातों को अपने रिकार्ड से मिलान करने के बाद । उन्हें भी ससम्मान इस कार्यक्रम में शामिल होने का अनुरोध किया। जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया और अभी अभी ही यहां उपस्थित हुई है ।आइये आप भी अंदर आइये और उनके उदबोधन का आनंद लीजिये .
रमेश जी ने जब पूर्व प्राचार्य के मुख से कलेक्टर महोदया के बारे में बातें सुनी तो बेहद परेशान हो गया। कुछ देर में ही उसका सारा शारीर पसीने से नहा गया। वह तुरंत ही ड्राइवर को तेजी से दुर्ग चलने कहा। वह कलेक्टर महोदया भारती ठाकुर का सामना भी नहीँ करना चाहता था। रमेश ने तुरंत दुर्ग पहुंचकर अपने पिता को सारी बातें बताई और कहा कि अब मेरा दुर्ग में कलेक्टर महोदया भारती ठाकुर के मातहत के रूप में कार्य करना घातक होगा।बस क्या था रमेश जी अपने पिता कि सलाह पर लम्बी छुट्टी पर चले गए और दो महीनों बाद उनका ट्रांसफर बैतूल जिले में हो गया। उसके एक साल बाद ही मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ अलग हो गया। और फिर न रमेश जी कभी छत्तीसगढ़ आये न ही उनका सामना माला भारती ठाकुर महोदया से हुआ। रमेश जी आज भी बैतूल जिले में पदस्त हैं और बिना भय के अपना जीवन बिता रहे हैं। वहीं माला भारती ठाकुर हो अब अपने नाम के आगे से माला शब्द कानूनी रूप से हटवा चुकी थी। छत्तीसगढ़ राज्य कि चीफ सेक्रेटरी बन चुकी थी। उनकी प्रशासकीय क्षमता का सभी तारीफ़ करते थे । उसे केंद्र कि सरकार ने एक विशेष कार्यक्रम में देश के बेस्ट सचिव के रूप में सम्मानित भी किया था। उसी कार्यक्रम के दौरान जब भारती ठाकुर को मंच पर आकर कुछ कहने के लिए कहा गया तो उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि मेरे जीवन का टर्निग प्वाइंट कक्षा ८ में आया था जह मैं धमधा ब्लाक के बरहापुर स्कुल में पद्धति थी। तब किसी राजनैतिक दबाव से मुझे उस स्कूल से निकलवा दिया गया साथ ही मुझे धमधा ब्लाक के किसी स्कूल में एडमिशन नहीं लेने दिया गया . तब ही मैं अपने मामा के घर बड़े किलेपाल बस्तर चली गई और वहीँ से अपनी आगे कि पढ़ाई की। वहां मुझे जीवन का दर्शन जो देखने मिला उसी कि बदौलत मैं आज इस मुकाम तक पहुंची हूँ। अत: मैं अपनी सफलता की श्रेय बड़ेकिलेपाल कि स्कुल जहां से मैंने ८वी से १२वी तक कि पढ़ाई किया है . और बरहापुर स्कूल को देती हूँ जहां से मुझे जबरदस्ती निकाला गया था । इतना कहके वह रोती हुई मंच से उतर गई और समूचा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से आधे घंटे तक गूंजता रहा . . ..

( समाप्त)
(डॉ संजय दानी दुर्ग सर्वाधिकार सुरक्षित )

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