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5 Nov 2025 · 2 min read

सरहदें

सरहदें

बाँट देती हैं सरहदें
बँटना तो कोई नहीं चाहता
वो बाँट देती हैं दिल, जमीऱ
रिश्तों रूपी जागीर को
सौंधी मिट्टी की महक
लाल कंणिकाओं में बहते ख़ून को

वो नहीं जानती कि उस पार भी
संवेदनाएं हैं, परम्पराएं हैं
अहसास हैं महकती याद है
किसी के पसीने से सींचे अरमान
किसी का कच्चा घरौंदा है II

किसी के इंतज़ार में निकलती सिसकियाँ
किसी के प्रेम की वो बासंती बयार भी
जिसकी आहट भर से महक जाते हैं
दिल के गुलफाम और उफ़न जाते हैं II

यादों के समंदर
कितनी संस्कृतियाँ कितने विचार
कितनी भाषाएँ, कितने व्यवहार
कितने प्राकृतिक विहंगम दृश्य
ना जाने कितने असंख्य विछोह
लेकर फ़नाह हो जाते हैं II

मगर सरहदें कहाँ सुनती हैं
किसी मासूम दिलों के दर्द को
उनका तो काम ही बाँटना हैं
हंसी और सुकून से पूर्ण ख़्वाबों को
जिनको बुनने में सदियाँ बीत जाती हैं II

मग़र सरहदों को बनाने वाले
ख़ुद भी तो बँट जाते हैं
नफरतों के सँकीर्ण जाल में
उनको भी झेलना पड़ता है वही
दर्द वही टिस अपनों के बिछूड़ने की
कब रह पाते हैं वो अछूते II

उस पीड़ा से सने मकड़जाल से
मग़र अहं और मजहब की खाइयाँ
दबा देती हैं उनकी पीड़ाएं
क्योंकि उनकी मति पे लिपट जाती हैं
भ्रम और गुमान से सटी कंटीली लतायें II

आख़िर झुकना तो पड़ता हैं उन्हें भी
जब अहसास होता हैं जख्मों की पीड़ का
आख़िरकार ख़ुद को मिटा देते हैं वो
इसी आवेश की धधकती ज्वाला में
क्योंकि सरहदों का काम तो यही हैं बाँटना II

वे निरमोही कहाँ सुनती हैं
नहीं समझती वे प्रेम की आग
क्या होती है मिलन की कसक
जुदाई की घड़ियाँ कहाँ समझ पाती हैं
क्योंकि बाँटना तो कर्म है उनका II

और इसी बंटवारे में
न जाने कितने मजहब
कितने अहसास
माथा पीटती मातांओं के क्रधंन
गूँजते हैं चारों दिशाओं में
कहाँ सुन पाती हैं वो
इस असहनीय वेदना को II

कोई फर्क नहीं पड़ता उनको
इतने गहन परिवर्तन से
और वो यूँ ही अडिग रहती हैं
क्योंकि सरहदों का काम तो
सिर्फ़ और सिर्फ़ बाँटना है II
काश सरहदें ना होती
तो ये बंटवारे कभी ना होते
जलते “दीप” खुशियों के
हर देहरी आँगन में………… II
****
कुलदीप दहिया “मरजाणा दीप”
हिसार ( हरियाणा )

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