जीवन धन
///जीवन धन///
स्वप्न लोक में विचरण करती,
कभी न पा सकी स्वप्नों को।
जनजीवन से यूं दूर उलझकर,
कैसे पा सकती हूं अपनों को।।
जहां नहीं है जीवन धन कोई,
वहीं अस्तित्वहीन भटक रही हूं।
आसमानी आशाओं को लेकर,
अधरतल में उलझ लटक रही हूं।।
यथार्थ जीवन बेला में आकर,
करूं कुछ यजन सृजन का।
उपजी मन में करुणा जग की,
करुं निर्माण सुजन धन का।।
नित अध्वर कमनीय दृगों से,
दृष्टि हटा लो कर्मशील प्राणी।
मिलते सपनों के भोग न कोई,
जीवन जी लो भूमिपुत्र दानी।।
करुं भूमि अभिलेख चित्त से,
अब न स्वप्न ढूंढने जाऊंगी।
मन के कल्प किरीट को लेकर,
क्योंकर स्वप्न चित्र बनाऊंगी।।
अब कर्मकरी वाणी को ही,
देना होगा लेकर संजीवन।
दे सकूं कर्म पथ पर चलकर,
जन मन को उषा का प्रेरण।।
इस उलझी स्वार्थपरता में ,
करुं सुचारिता का संचार।
माया से लिपटी कटुता का,
कर सकूं सदा ही प्रतिकार।।
तीव्र वात झोंका बनकर आऊं,
जो करे पड़ी राख का निस्सारण।
वह उजले तप्त अंगारों को भी,
करती हैं ढंक मलीन निष्कारण।।
अब सहस्त्रांशु से आशा लेकर,
जनमन के कंठ में बसना होगा।
जो जगा सके उलझे मानस को,
ऐसा तो कुछ नित करना होगा।।
स्वरचित मौलिक रचना
रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)