गुरु नानक देव
//गुरु नानक//
( प्रस्तुत कविता में वंड छको गुरु नानक की तीन शिक्षाओं नाम जपो, किरत करो, वंड छको में से एक है। जिसका अर्थ है – अपनी कमाई हुई वस्तुएँ, भोजन और धन को ज़रूरतमंदों के साथ बाँटकर खाओ या उपभोग करो।क्योकिं तुम अकेले नहीं हो।)
वह शिशु नहीं था।
एक मौन प्रस्थान था
तलवंडी की गोधूलि में।
आँखों में तैरता
अकारण विस्मय।
देखता था वह
खेतों की मिट्टी को,
जो चुपचाप रूढ़ियों का बोझ सहती है।
और पूछता था
बीज का धर्म क्या है?
केवल उगना? या सत्य की
एक अखंड अभिव्यक्ति?
जनेऊ।
वे लाते हैं कच्चा धागा,
लिपटा हुआ वंशक्रम के
जीर्ण-शीर्ण तर्क से।
वह स्वीकार नहीं करता।
सिर्फ हँसता है।
एक तीव्र, निर्मम हँसी।
”मुझे चाहिए अहिंसा का तंतु,
आत्मिक धैर्य का रंग।”
टूट जाता है सहस्राब्दियों का भ्रम।
धागा गिर जाता है
महत्वहीन होकर।
उदासी।
एक यायावर की पदचाप,
जो दिशाओं को नहीं,
मनुष्य के भीतर की
अंधेरी गलियों को नापती है।
पर्वतों पर, जहाँ मौन एक मुद्रा है,
वह बोलता है
“नश्वरता एक सत्य है, पर तुम नहीं।”
नदी के तट पर, जहाँ जल
निरंतरता का प्रतीक है,
वह गाता है
“स्मरण ही तुम्हारा एकमात्र कर्म है।”
वे पूछते हैं
खुदा कहाँ है?
वह दिखाता है
रोटी पर बैठी भूख।
शोषक की निर्वस्त्र क्रूरता।
और कहता है
“यदि तुम इन सबके बीच उसे नहीं पाते,
तो वह कहीं नहीं है।”
उसने कहा
ओ३म्— शून्य से उपजा
एक अद्वितीय नाद।
उसने मध्यमार्ग दिया।
न जंगल की अतिरेकी तपस्या,
न गृहस्थ का क्षुद्र मोह।
एक सचेत जीवन।
किरत करो।
अपने श्रम से अछूता मत रहो।
नाम जपो।
स्मृति को अपनी श्वास बना लो।
वंड छको।
तुम अकेले कभी नहीं हो,
इसलिए अकेले उपभोग मत करो।
गुरु नानक
वह एक विराम थे।
एक प्रश्नचिह्न,
जो आज भी
हमारे सुविधा-संपन्न जीवन के केंद्र में
चमक रहा है।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’