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5 Nov 2025 · 7 min read

बाल ग़ज़ल

18
काली -काली कोयल रानी, मीठा- मीठा गाती है
अपनी तान सुनाकर सबको ,दीवाना कर जाती है

इतनी नन्हीं सी होती है,प्यारी प्यारी ये चिड़िया
पत्तों में ही छुप जाती है, नजर न हमको आती है

इतनी है आवाज सुरीली, मंत्र मुग्ध हम हो जाते
कुहू कुहू का गीत सुनाकर, हमको सुबह जगाती है

कौआ भी है काला -काला, लेकिन बोली है कर्कश
मगर मधुर कोयल की बोली, पता नहीं क्या खाती है

बौर आम पर जब आता है, सारी धरा महक जाती
कूक -कूक कर कोयल रानी, शुभ संदेशा लाती है

कोयल इतनी भोली भाली, कौए के अंडे सेती
फर्क पराए अपने का भी,ज़रा नहीं कर पाती है

कोयल की ये मीठी बोली, काम दवा का भी करती
शांत’ अर्चना’ मन को करती, सब संताप मिटाती है
17
आसमान में छाते बादल
सबके मन को भाते बादल

कभी ओढ़कर काली चादर
लहर -लहर लहराते बादल

खुश हो जाते ताल तलैया
पानी जब बरसाते बादल

कड़ी धूप जब हमें सताती
सूरज कहीं छुपाते बादल

प्यास बुझाकर धरती माँ को
हरियाली पहनाते बादल

कभी -कभी तो गरज- गरज कर
हमें बहुत धमकाते बादल

जब काले बादल छट जाते
तब नीले हो जाते बादल

कलाकार ये बड़े ‘अर्चना’
नभ में चित्र बनाते बादल

*******************************************यहां तक,🙏🏻🙏🏻,,/////////८&✓✓✓✓✓✓

16

माँ को आजादी दिलाने के लिए बेहाल थे
चन्द्र शेखर नाम जिनका भारती के लाल थे

देश सेवा के लिए खुद को समर्पित कर दिया
देशहित में ही सदा वो चलते अपनी चाल थे

उम्र थी छोटी मगर उनकी रगों में जोश था
हर फिरंगी के लिए वो बन गए जंजाल थे

वीर हिंदुस्तानियों से प्यार था उनको बहुत
हो दुखी जाते उन्हें जब देखते बदहाल थे

दुश्मनों को देते उत्तर ईंट का पत्थर से वो
छोड़ते उनको नहीं थे, खींच लेते खाल थे

दुश्मनों के हाथ मरना चाहते थे वो नहीं
मारकर गोली स्वयं का बन गए वो काल थे

सिद्ध मरकर कर दिया आजाद था आजाद हूँ
वो कभी झुकते नहीं थे ऊँचा रखते भाल थे

जो भी मन में ठान लेते करके दिखलाते वही
‘अर्चना’ वो कहने भर को कब बजाते गाल थे

27-02-2023

15

मस्ती करना, मौज उड़ाना
बचपन कितना लगे सुहाना*

बात जरा सी हो, झट जाकर
माँ के आँचल में छुप जाना

दादी -दादा और बुआ का
बात बात पर लाड़ लड़ाना *

खाना खाने में नखरे कर*
माँ को पीछे ख़ूब भगाना

माँ का मनुहारें कर करके
रोज सुबह को हमें जगाना

बार -बार हम करें गलतियाँ
बार -बार माँ का समझाना

रूठ ज़रा सा क्या हम जाएं
पापा का हर तरह मनाना

छोड़ ‘अर्चना’ जाता बचपन
यादों का अनमोल खजाना

01-12-2022
डॉ अर्चना गुप्ता

14
सूरज काका अनुशासित हो, सारे नियम निभाते हैं
बैठ समय के पहिये पर ये, हमसे मिलने आते हैं

पूर्व दिशा से निकल जगत में, नव संचार जगाते ये
दिन भर तपकर थक जाते जब, पश्चिम में सो जाते हैं

वैसे तो दिल के अच्छे दोस्त हमारे हैं सच्चे
लेकिन कभी -कभी ये हमको अपनी अकड़ दिखाते हैं

जब सर्दी के दिन आते हैं, खुद बादल में छिप जाते
कई- कई दिन नहीं निकलकर, हमको खूब सताते हैं

गर्मी के मौसम में भी ये, करते रहते मनमानी
खूब चमक अपनी दिखलाकर, हमको रोज जलाते हैं

सदा खेलते रहते हैं ये, आँखमिचौली अपनों से
कभी धूप से नहलाते तो, कभी छाँव ले आते हैं

दुनिया सारी नत मस्तक हो, नमन ‘अर्चना’ करती है
आशाओं का नया सवेरा, सूरज काका लाते हैं

15-05-2022

13
चंदा मामा आओ तुम
सपने नये दिखाओ तुम

मीठी लोरी गा गाकर
आओ हमें सुलाओ तुम

कितने प्यारे लगते हो
हम से प्रीत निभाओ तुम

मन को भाते हैं तारे
उनसे भी मिलवाओ तुम

रूठा-रूठी छोड़ो अब
छुपकर नहीं सताओ तुम

कब से तरस रहे हैं हम
अब तो गले लगाओ तुम

दूर ‘अर्चना ‘ रहते हो
पास कभी तो आओ तुम

12

बालक बहुत बड़ा मैं ज्ञानी
कर जाता हूँ पर नादानी*

करता मैं इतनी शैतानी*
याद दिला देता हूँ नानी

रूप धरूँ मैं तरह तरह के
हरकत मेरी हर बचकानी

अपनी रोज शरारत से मैं
लिख देता हूँ नई कहानी

मम्मी- पापा का मैं राजा
दीदी उनकी बिटिया रानी

घर में मेरी जिद के आगे*
भरने लगते हैं सब पानी* )

मैं हूँ भोला भाला इतना *
डाँट मुझे पड़ती है खानी

कितना भी समझाले कोई *
करुँ ‘अर्चना’ मैं मनमानी

16-12-2020

11

प्यारी प्यारी तितली रानी
भोली भाली बड़ी सयानी

रंगबिरंगे पर हैं सुंदर
फूलों की रहती दीवानी

टिकती नहीं कहीं भी इक पल
करती रहती है शैतानी

हाथ नहीं बच्चों के आती
याद दिला देती है नानी

शोर नहीं करती है बिल्कुल
करती है अपनी मनमानी

फूलों का ही रस पीती है
मगर न पीती सादा पानी

अपनी ही धुन में रहती है
बहुत अर्चना’ है मस्तानी

24-11-2020

10

गर्मी के मौसम की आहट आती है
सर्दी सब अपना सामान उठाती है

चारों ओर बहारें छा सी जाती हैं
कुदरत अपना रूप नया दिखलाती है

आमों की खुशबू आती हैं बागों से
तान कोकिला अपनी मधुर सुनाती है

रंगबिरंगे फूलों की भीनी खुशबू
सबके ही मन को मदहोश बनाती है

स्कूल किताबों से मिल जाता छुटकारा
गर्मी की छुट्टी बच्चों को भाती है

खरबूजा तरबूज जरा सा खाने से
गर्मी से थोड़ी राहत मिल जाती है

पहन बसंती वस्त्र ओढ़कर हरियाली
धरा ‘अर्चना’ फूली नहीं समाती है

19-05-2020

9X इसे नहीं लिया है

कोरोना ने आग लगाई
कुछ भी देता नहीं दिखाई

स्कूलों ने की लंबी छुट्टी
हम बच्चों की आफत आई

घर में बन्द पड़े रहते अब
करनी पड़ती हमें सफाई

पहले मिलता फोन नहीं था
आज उसी पर करें पढ़ाई

दोस्त सखी नहीं अब कोई
दूरी सबसे खूब बनाई

मुरझाया भोला सा बचपन
मायूसी सी उस पर छाई

जीतेंगे तुझसे कोरोना
माना लंबी अभी लड़ाई

12-05-2020

8

चंदा मामा गोरे गोरे सबके मन को भाते हो
ये बतलाओ किस साबुन से आखिर रोज नहाते हो

हमने तो आकार बदलते हर दिन तुमको देखा है
चंदामामा किस दर्जी से, कपड़े तुम सिलवाते हो

छोटा सा है रूप तुम्हारा गोल गोल रोटी जैसा
इतनी सारी धवल चाँदनी, कैसे सँग में लाते हो

हमने तुमको घड़ी बाँधते, नहीं कभी भी देखा है
कैसे तुम फिर रोज रात को, सही समय पर आते हो

इतने सारे नभ में तारे, अठखेली करते रहते
कैसे उनके साथ अकेले, मंद मंद मुस्काते हो

7
सत्य अहिंसा पर चलना है, बापू ने सिखलाया था।
मानवता का क्या मतलब है, यह हमको समझाया था।

सादा जीवन उच्च सोच यह ,मूल मंत्र जीने का है
तीन बंदरों से जीवन का, हमको पाठ पढ़ाया था।

स्वा अनुशासन- अवलंबन का, सूत्र उन्होंने दिया हमें
सेवा सबसे बड़ा धर्म है हमको यह बतलाया था।

अग्रेजों का हुआ बहुत था , भारत में जीना दूभर,
जब भारत में गांधी जी ने, सत्याग्रह चलवाया था

राष्ट्रपर्व की तरह जनम दिन, उनका सभी मनाते हैं
इस आज़ाद हिंद का सपना,सच कर के दिखलाया था।।

तभी हमारे प्यारे बापू, राष्ट्रपिता कहलाते हैं।
आजादी का हार भारती
माता को पहनाया था।

6

दूर गगन तक फैला बादल अच्छा लगता है
वह थोड़ा आवारा पागल अच्छा लगता है

गोरे- गोरे मुखड़े पर नीली -नीली आँखें
कभी लगाता है जब काजल अच्छा लगता है

चाँद सजाता है बादल के माथे पर बिंदी
टँका सितारों का भी आँचल अच्छा लगता है

कभी डराता काला बादल कभी धूप में बरसे
करता रहता अक्सर yah छल अच्छा लगता है

चित्र बनाता रहता बादल नभ में नये नये
इंद्रधनुष जब बनता वो पल अच्छा लगता है

उमड़ घुमड़ कर गरज गरज करे ‘अर्चना’ बातें
बादल जब बरसाता है जल अच्छा लगता है*
16-07-2019

5
माँ तो जैसे एक परी सी लगती है
खुशियों से बच्चों की झोली भरती है

देख नहीं पाती है बच्चों को दुख में
उनके रोने पर माँ भी रो पड़ती है

अपने बच्चों पर माँ हो वारी -वारी
बात -बात पर नज़र उतारा करती है

सब कहते हैं मैं हूँ बिल्कुल माँ जैसी
मेरे अंदर ही मेरी माँ बसती है

खो जाती माँ अक्सर मेरी आँखों में
मुझमें अपना बचपन ढूँढ़ा करती है

बच्चों के सपने ही हैं माँ के सपने
उनके पीछे ही दीवानी रहती है

लगी ‘अर्चना’ पूजा में नित माँ रहती
बुरा न हो जाये कुछ इससे डरती है

1
चली जोर से हवा हवाई
भागो भाई आँधी आई

बन्द करो खिड़की दरवाजे
मम्मी ने आवाज लगाई

राज अँधेरों का फिर आया
आँधी ने बिजली भगवाई

छोटी -छोटी कच्ची अमिया
आँधी ने भी खूब गिराई

भाग -भाग कर बीन-बीन कर
हमने खट्टी आमी खाई

काले -काले बादल अपने
आँधी साथ उड़ा कर लाई

रिमझिम- रिमझिम पानी बरसा
आँधी की तब हुई विदाई

रुकी अर्चना जब आंधी तो
घर की करनी पड़ी सफ़ाई

2

आग दिवाकर ने बरसायी
बड़ी भयंकर गर्मी आयी

मक्खी मच्छर ने गर्मी में
अपनी दादागिरी दिखायी

तेज बुखार उसे ही आया
गर्मी में जिसने लू खायी

मैंगोशेक पिएं भर -भर कर
आइसक्रीम सभी को भायी

गर्मी की जो हुई छुट्टियाँ
मम्मी की तो आफत आयी

हमें घुमाने ले जाने को
पापा ने सब बुकिंग करायी

जैसे गर्मी बढ़ी ‘अर्चना’
बिजली ने भी आँख दिखायी

3

सर्दी आई सर्दी आई
अच्छी लगने लगी रजाई

श्वेत ओढ़नी कोहरे ने फिर
धरती को चहुँ ओर उड़ाई

मफलर, टोपी,कोट- पुलोवर
धूप सुनहरी मन को भाई

गज़क ,रेबड़ी-मेवाओं ने
बाजारों में धूम मचाई

नल का पानी कितना ठंडा
लगे नहाना भारी भाई

हीटर और अँगीठी आला
घर- घर जलता पड़ा दिखाई

हुआ वही बीमार ‘अर्चना’
जिसने भी ये सर्दी खाई

4

रवि शशि आते बारी बारी
करें सुबह और शाम हमारी

दिन तो होते गोरे गोरे
काली लेकिन रात बिचारी

रात सुलाती, दिवस जगाता
अलग- अलग दोनों की पारी

मिले रात दिन नहीं आज तक
कैसी है इनकी लाचारी

लगे चाँदनी भली चाँद को
धूप लगे सूरज को प्यारी

बहुत जरूरी दिवस रात हैं
चलती इन पर दुनिया सारी

अलग ‘अर्चना’ रहते दोनों
फिर भी खूब निभाते यारी

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