ख़ुदा
भीड़ में
ख़ुदा से
मुलाकात हो गई
पहचान गई
पर फ़िर
दुनिया में खो गई
एक रोज़
तन्हा थी मैं
मैं का चोला
उतार बैठी थी
देखा खुदा की
रोशनी को
मेरी भीतर कहीं
छुपी थी
ये दुनिया
बड़ी नई थी
सुकून से
भरी थी
मन मगन
हो गया था
भीतर वो
मिल गया था
जो भीड़ में
खोजती थी।