मिला ना नेक हमसफ़र
नेक हमसफ़र मिल ना सका , पिता द्बारा,भाई द्बारा या के लडकी भाग्य द्बारा।
खोज के नाम पर छुपकर शिवानी ने फोटो (लड़के)देखी थी, और कुछ बातें सुनी थी।
चर्चा मंच और चुनाव सब चंद सवाल लम्हों में मैं पराई हो जाउंगी, धाराशाई हो गई,मेरे मन में ही रह गया।
ना शिवानी पागल थी ना है। मुद्दतों के बाद शिवानी की अनुमति से उनके दर्दनाक कहानी,कलम से शुरू कर भावना को शब्द में शामिल किया है। शिवानी एक क्षत्रिय समाज में एकलोती बेटी , अपने मां -बाप की , उसके तीन बहुत ही सुन्दर और अच्छे भाई भाग्य से है। पर जीवन पद्धति के बीच विवाह सौभाग्य नहीं पीड़ा बनकर उभरा उसके जीवन में जो नासूर बन गया।
इस विवाह और एकदम से तत्काल से शिवानी टूट गई, उसने देखा एक दिन कि अपने से ज्यादा पापा को रोते , मम्मी को रोते हुए रोकते, तुडते – जुड़ते असहाय महसूस भाई को, उसी दिन शिवानी ने आत्महत्या ना करूंगी, ना दुःखी होगी,जो अपनी बहन को तकलीफ़ में जरा भी नहीं देख सकते ।
उस छोड़ पति ने कुछ ही दिन विवाह कर लिया अपने गर्लफ्रेंड, और अपने, मां-बाप,समाजके सामने जिसके साथ अग्नि के फेरे लिए थे जिसे अर्धांगिनी बनाई उस शख्स ने उसे ज़लील किया,और अपने रची साजिश के तहत विवाह – विच्छेद कर दिया गया इस दौरान उन्होंने कई बार तो शिवानी को अपमानित किया और सबसे बड़ी जिंदगी नासूर बना दिया।
प्लीज कैसी लगी बताइए.
डॉ सीमा कुमारी 4-11-025की स्वरचित रचना, जिसे आज प्रकाशित कर रही हूं।