#सामयिक
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■ मानें तो हर दिन दीवाली।
[प्रणय प्रभात]
“मन रहे स्वदेशी का प्रेमी, ना वस्तु विदेशी पर बहके।
अपनी मिट्टी का सौंधापन, हर बार दिवाली पर महके।
अपना आंगन अपनी क्यारी, क्यों ना अपने पौधे रोपें?
ये कहो विदेशी हाथों में, अपनी लक्ष्मी को क्यूं सौंपें??
डिस्काउंट का झांसा देकर नक्काली को बढ़ावा देती ऑनलाइन ट्रेडिंग और एक के बदले एक फ्री की आड़ में कालातीत व घटिया उत्पाद की ब्रांडिंग पर निर्भर मॉल कल्चर के विरुद्ध उक्त छोटी सी कविता में महापर्व “दीवाली” मात्र एक प्रतीक है।
हर दिन एक उत्सव की परंपरा वाले हमारे देश में स्वदेशी के प्रति लगाव वर्ष भर हर पर्व, हर उत्सव, हर आयोजन में होना चाहिए। बशर्ते “लोकल” की मानसिकता “आपदा में अवसर” से प्रेरित होकर लूट की छूट से प्रभावित न हो।
स्थानीय स्तर के उत्पादकों, वितरकों और विक्रेताओं को भी चाहिए कि अपने देश की संस्कृति व पुरखों की परंपरा का अनुसरण कर ग्राहकों को देवतुल्य मानें और उन्हें उल्टे उस्तरे सेे मूंडने की उस वृत्ति का त्याग करें, जो एकाधिकार से प्रेरित है।
आज वैश्विक चुनौतियों के सामने देश की स्थिति को स्थिर रखने के लिए जितना स्वदेशी आम नागरिक को होना होगा, उतना ही विवेकी निर्माता और विक्रेता को भी होना होगा, जो कालाबाजारी, अवैध भंडारण और मुनाफाखोरी पर भरोसा कर माल की गुणवत्ता से ही नहीं जनहित व लोक स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने के आदी हो चुके हैं। याद रखना चाहिए कि ताली एक हाथ से नहीं बजती। जय राम जी की।
-सम्पादक-
●न्यूज़&व्यूज़●
(मध्य-प्रदेश)