कर्मठता श्रेष्ठ गुण
कर्मठता की अग्नि में खिलते हैं कुंदन ।
धर्मशिला पर बैठ कर होते हैं तप पूर्ण।।
निर्बलता का चोला पहनकर ना चलना जीवन पथ।
सबलता का लेपन करके महका लेना तन_मन।।
परिश्रम के हार गले में कुंदन बनकर चमकते है ।
आलस्य भरे स्वर्ण घड़े भी,एक दिन मिट जाते है ।।
यूंही नहीं शीतल जल देता है घड़ा माटी का ।
अग्नि में जलकर स्वयं जान पाता है महत्व शीतलता का।।
जीवन में कर्मठता और धर्म का अनुसरण करते हुए जीवन को गति और खुद को आत्मबल दे ।
निरंजना डांगे
बैतूल मध्यप्रदेश