अनहद नाद
प्रस्तुत है _
एक गूढ़ विषय पर
एक काव्य रचना
एवं प्रस्तुति से पहले
उसका तार्किक विश्लेषण_
विषय – शास्त्रीय संगीत का
ईश्वरीय संयोग और अनहद नाद
संस्कृत में एक श्लोक है_
पूजात् कोटिगुणं स्तोत्रं
स्तोत्रात्कोटिगुणो जपः।
जपात्कोटिगुणं गानं
गानात्परतरं नहिं ।।
अर्थात पूजा से करोड़ गुना
श्रेष्ठ स्तोत्र है,
स्तोत्र से करोड़ गुणा श्रेष्ठ जप है,
और जप से करोड़ गुणा श्रेष्ठ गान है।
कहा गया है कि भगवान का
निवास योगियों के योग में नहीं,
तपस्वियों के तप में नहीं,
यज्ञिकों के यज्ञ में नहीं..
वरन्..
मदभक्ता यत्र गावन्ति,
तत्र तिष्ठामि नारदः
अर्थात मधुर स्वर से आर्त होकर
गाने वाले भक्तों के हृदय में
ही भगवान वास करते हैं।
अतः गायन से बढ़कर
उपासना का कोई
अन्य साधन नहीं है _
लेकिन एक प्रश्न है कि ,
किस प्रकार के गायन से
ईश्वरीय संयोग स्थापित होता है..
तो आपका उत्तर मिलेगा _
भजन, कीर्तन,अरदास
कर लेने से मनुष्य का
मन ईश्वरीय शक्ति से
निकटता महसूस करता है..
लेकिन इस विषय पर सुक्ष्मता से
तार्किक विश्लेषण
किया जाना आवश्यक है।
भारतीय संगीत सप्तक के
सात स्वरों से निर्मित
संगीत प्रतिदिन सुनना
आपके दिमाग की सरंचना को तो
बदलने में सक्षम है,
लेकिन इसकी परिणिति ईश्वरीय संबंध
स्थापित करने के लिए
निश्चित रूप से सक्षम होगी,
इसकी कोई गारंटी नहीं है।
आप जिस तरह का संगीत सुनते है,
दुनिया को भी आप उसी तरह
से ही देखते है..
तेज आवाज में द्रुत लय संगीत सुनना
कम समय में ज्यादा शराब
पीने के जैसा है..
विलम्बित लय और शांतिपूर्ण संगीत
को सुनने से मस्तिष्क के उस हिस्से
को शांत किया जा सकता है
जो चिंता और तनाव से
संबंधित होता है।
संगीत का सौंदर्य उसकी शुद्धता,
उसकी संरचना और उसकी
भावनाओं में निहित होता है।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में
विलम्बित लय गहरे
आध्यात्मिक दर्शन से जुड़ा है,
जहाँ संगीत को ब्रह्मा के आनंद
के समान अर्थात ब्रह्मानंद सहोदर
माना गया है।
भारतीय संगीत में नाद
स्वयं में ही सुंदर ध्वनि है।
नाद में ही सत्यं शिवं सुन्दरम
का समन्वय है।
नाद की साधना से ही
सत् चित् और आनंद की
प्राप्ति सम्भव हो पाता है
नाद को आत्मानुसंधान में
सहायक व्यक्त किया गया है।
‘नाद’ का अर्थ ध्वनि या कंपन है
और ‘अनहद’ का अर्थ है
‘बिना आघात के उत्पन्न’।
नाद के दो प्रकार हैं,
अनहद नाद और लौकिक नाद
जो नाद,
दो वस्तुओं के परस्पर घर्षण से
अथवा टकराने से
मतलब आघात से पैदा होती है
उसे लौकिक या आहत नाद
कहते हैं..
ऐसा माना जाता है कि
अनहद या अनाहत नाद को
एक योगी का हृदय ही
अनुभव कर सकता है।
यह एक योगी अथवा
साधक को ब्रह्मलीन कर
अलौकिक आनंद की
अवस्था में पहुंचा देता है,
जहां सभी विषय विकार
समाप्त हो जातें हैं।
संगीत में प्रायः आहत नाद का
उपयोग होता है।
अनहद नाद को हमारे स्व या
हमारी आत्मा का उर्जा कंपन
कहा जाता है,
ओंकार या ओउम (ऊँ) अनहद नाद का
निकटतम प्रतिनिधित्व है,
और इसे प्राप्त करने का
एक प्रतिबिंब मात्र है।
अनहद नाद से संबंधित रहस्य
निम्नांकित छंद पर ध्यान देने
से स्पष्ट होता है _
“आहत साधे साधक सुख पावे
अनंग रंग ताको सहस निस तारे,
अनहद नाद अंतर गूंजे
आहत नाद ताको प्रकाश दिखावे.”
नारदीय शिक्षा ग्रंथ के अनुसार
स्वरों की अभिव्यक्ति के लिए
नाभि प्रदेश के साथ
वायु का संबध अनिवार्य है।
संगीतोपयोगी स्वरों के उद्भव का
यही मूल उद्गम है।
नाभि से उद्भूत वायु हृदय,
कंठ, जिव्हा, तालू, नासिका एवं
मस्तक के सहयोग से स्वरों की
उत्पत्ति में सहायक होती है।
हमारे संगीत शास्त्रियों के अनुसार
यदि हम किसी भाव को स्वरों के
माध्यम से व्यक्त करना चाहते हैं
तो आत्मा मन को प्रेरित करती है,
मन शरीर में रहने वाले
अग्नि को जगाता है,
अग्नि वायु को उठाती है,
इस वायु के कंपायमान होने पर
क्रमशः नाभि स्थल से ही
नाद की उत्पत्ति होती है।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में
विलम्बित लय का आध्यात्मिक
महत्व निम्नलिखित तरह से
समझा जा सकता है:
भारतीय दर्शन में,
ब्रह्मांड की उत्पत्ति नाद (ध्वनि) से
मानी जाती है,
जिसे ‘नाद ब्रह्म’ कहा जाता है।
विलम्बित लय में स्वरों का विस्तार
(आलाप) करते समय,
कलाकार नाभि स्थल से
उत्पन्न होने वाले इस
आंतरिक नाद को खोजने का
प्रयास करता है।
स्वरों पर ठहराव और विस्तार
की यह प्रक्रिया उस परम ब्रह्म
तक पहुँचने का एक साधन
मानी जाती है।
विलम्बित लय शैलियों में
श्रृंगार या वियोग रस को
प्रभावी ढंग से व्यक्त करते समय
इसमें भावों के माध्यम से
भक्त और ईश्वर के बीच का
संबंध और गहरा हो जाता है।
विलम्बित लय बहुत धीमी
अर्थात आमतौर पर 10 से 40 बीट
प्रति मिनट होती है..
यह गति, मन को शांत करने
और उसे बाहरी दुनिया से
ध्यान हटाकर आंतरिक शांति
और ईश्वर की ओर उन्मुख करने में
मदद करता है ।
ईश्वर तो निराकार होता है
फिर भी हम भक्ति शृंगार रस में
उनके अनुपम सौंदर्य का बखान
कर उस निराकार तक पहुंचने
का प्रयास करते हैं।
इसी तरह राग में भी
रस तत्त्व ही अनुभूति मात्र है
जिसका कोई आकार नहीं होता है।
अब देखिए भगवद् तत्त्व भी
रस की तरह निराकार होते हुए
भी आनन्दमय है।
मन को समाहित करने के लिए
स्थूल आधार की आवश्यकता
पड़ने पर मूर्ति पूजा की
जरूरत आन पड़ती है..
इसलिए आप देखेंगे कि
भारतीय सनातन दर्शन में
निराकार तक पहुंचने
के लिए साकार मूर्ति रूप को
पूजा उपासना में
प्राथमिकता दी जाती है..
राग रस में डूबने के लिए
राग ध्यानों के सहारे राग के
देवमय रुपों को एक
निश्चित रूप दिया गया।
गीता में कहा गया है कि _
“स्वभावों अध्यात्मुच्चते”
अर्थात मनुष्य का स्वभाव
ही अध्यात्म है..
अध्यात्म में ज्ञान कर्म और
उपासना का विशेष स्थान है
तथा अध्यात्मिकता का मूल
एकाग्रता या ठहराव में है..
वही ठहराव जिसका उल्लेख
महात्मा बुद्ध ने खुंखार अंगुलिमाल
डाकू के लिए किया था ..
बुद्ध ने शांत व मधुर स्वर में
डाकू से कहा था_
” मैं तो ठहर गया..
भला तू कब ठहरेगा.. ?”
भारतीय संगीत के
शास्त्रीय पद्धति के
विलंबित सुर ताल में
स्वर मन को एकाग्र करके
इतना अधिक तल्लीन
तन्मय और स्थिर कर देते हैं कि
नाद ब्रह्म तक पहुंचने का मार्ग
प्रशस्त हो जाता है।
अनहद नाद तो प्रकृति में गूँजती
रहती है पर आम जन को सुनाई
नहीं पड़ती..
नदियों की कलकल ध्वनि,
झरनों की झरझर,
पंछियों का मधुर करलव,
किसने नहीं सुना है।
प्रकृति प्रदत्त जीवों के
हावभाव और क्रियाकलाप से
जो अन्तर्मन में नाद लहरी
उत्पन्न होती है,
वह अनहद नाद का ही स्वरूप है।
यह एक आंतरिक, दिव्य ध्वनि है
जिसे किसी बाहरी उपकरण
या भौतिक आघात (टक्कर) से
उत्पन्न नहीं किया जाता,
बल्कि ध्यान और आध्यात्मिक
साधना के दौरान अनुभव
किया जाता है।
इसे आत्मा या ब्रह्मांड की
शाश्वत कंपन माना जाता है।
प्रस्तुत है इस गूढ़ रहस्यमयी
विषय पर एक काव्य रचना ..
अनहद नाद
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शब्द अगणित सुना है मैंने
पर मन को कुछ न भाया,
शब्दें सुन सुन कर थक गए श्रुतिपुट
पर मन, ब्रह्मानंद न हो पाया ..
अनन्त आकाश की ऊंचाई से,
समुन्दर की गहराई तक..
शब्दें सुन नित मन आहत होता
अनाहत कहां हो पाया..
अब श्रुतिपुट को बस ऐसी चाहत
झूमे मन का हर-इक कोना
अनहद नाद की प्यासी श्रुतिपुट
चाहे बस नाद ब्रह्म को पाना..
गूंज रही है हलचल मन में
कर्कश ध्वनि की सुनकर नादें..
पथराई है श्रवण शक्ति भी
खोई जो मुरली धुन की यादें..
खाए मन अब धोखा कितना
सुनकर मन में मिथक तराना
अनहद नाद निनाद सुना दो
चाहे तुम दो पल को ही आना..
अनहद नाद की प्यासी श्रुतिपुट
चाहे बस नाद ब्रह्म को पाना..
“मौलिक एवं स्वरचित”
सर्वाधिकार सुरक्षित
© ® मनोज कर्ण
कटिहार ( बिहार )
तिथि –०३/११ /२०२५
कार्तिक ,शुक्ल पक्ष,त्रयोदशी,सोमवार
विक्रम संवत २०८२
मोबाइल न.– 8757227201
ईमेल पता – mk65ktr@gmail.com