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3 Nov 2025 · 1 min read

प्रेम तृणों से......

प्रेम तृणों से……

पलक पंखुड़ी में
प्रणय अंजन से
सुरभित संसृति का
श्रृंगार करो

भ्रमर गुंजन के
मधुर काल में
कुंतल पुष्प श्रृंगार करो

नयन तृषा को
तृप्त करो
और
क्षुधा क्षणों को स्वीकार करो

अपने उर की
अनुपम सुधि में
अपने प्रिय का
अभिसार करो

विस्मृत कर
प्रतिकार सभी
श्वास- श्वास श्रृंगार करो

चिर सुख के
प्यासे अधरों पर
तृप्ति वृष्टि का संचार करो

अभिलाषाओं की
बस्ती में तुम
सृजन का
नव संचार करो
प्रेम धरा पर
प्रेम पलों का
प्रेम तृणों से
श्रृंगार करो,

सुशील सरना

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