यथार्थ ……
यथार्थ ……
ऊपर वाले ने ये ज़मीन के रिश्ते भी कैसे बनाये हैं। सांसों तक ये रिश्ते भी ज़िंदा रहते हैं फिर धीरे धीरे अपना वज़ूद खोने लगते हैं। इस आभासी दुनिया में हर शै नश्वर होते हुए भी विश्वसनीय लगती है। शाश्वत सत्य हमारा डर बन जाता है और असत्य सम्पूर्ण जीवन।हम दीवारों को घर मान लेते हैं और घर को दीवारें। मैं,मैं, मैं …. आखिर कौन है ये ‘मैं ‘ ? वो जो इस देह के रूप में दृष्टिगोचर होता है या इस देह में अदृश्य रूप में निवास करता है ? इस प्रश्न का उत्तर सब जानते हैं फिर भी दैहिक ‘मैं ‘ को अर्थात नश्वरता को जीवन मान लेते हैं। इस भौतिक देह को स्वय मान हम भौतिक संसार में अमरत्व पाना चाहते हैं परन्तु क्या ये संभव है , शायद नहीं क्योंकि जब तक देह पंचतत्व में विलीन नहीं हो जाती तब तक अमरत्व के सफर का आरम्भ नहीं होता। तो फिर हम किस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जीते हैं ? क्या उसके लिए जिसे हम सिर्फ ५ मिनट देने में भी कतराते हैं फिर भी वो हमें अपने अंक में समा लेता है या उस भौतिक संसार के लिए जिसे हम सम्पूर्ण जीवन देते हैं पर हासिल कुछ भी नहीं होता ?
सुशील सरना/