#लघुकथा...
#लघुकथा…
शातिर सत्यवादी।
(प्रणय प्रभात)
चुनावी सीज़न था और सियासी मंच। मात्र पांच साल में दो कौड़ी से दस करोड़ी बना नेता माइक पर था। फर्श से अर्श पर पहुंचने के बाद कल की मिमियाती आवाज़ दहाड़ सी लग रही थी। हाथ बार बार ऊपर नीचे उठ रहे थे। खोपड़ी आगे पीछे, दांए बाएं घूम रही थी। सोने की मोटी और भारी अंगूठी से सजी उंगली हवा में लहरा रही थी। थोड़ी थोड़ी देर में तालियां गड़गड़ा रही थीं। ज़िंदाबाद के नारे सर्द मौसम को गर्मा रहे थे।
जोश और जुनून से भरा नेता समूचे विपक्ष सहित मीडिया और जनता को चीख चीख कर बस एक चुनौती दे रहा था कि “उसे किसी ने एक कप चाय पिलाई हो तो बताए।” मसला अपनी घोर नहीं घनघोर ईमानदारी को सरेआम साबित करने का था। बीस मिनट के भाषण में दस बार दोहराया जा चुका था उक्त जुमला। मजाल नहीं कि कोई एक भी खड़ा हो कर इस चुनौती का जवाब दे पाए। जबकि उसकी लूट, बेईमानी व भ्रष्टाचार के किस्से बच्चे बच्चे की ज़ुबान पर थे।
सभा ख़त्म होने के बाद भीड़ छंट गई। घंटे भर से मोर्चा संभाले मीडिया के कंपनी कमांडर भी पास के एक टी स्टॉल पर जा पहुंचे। गर्मा गर्म चाय की चुस्कियों के बीच चर्चा का मुद्दा बनी चिंदीचोर, चंदाखोट नेता की चुनौती। वही “एक कप चाय” पिलाने वाली। सवाल यह था कि इस चुनौती पर किसी के भी हलक़ से आवाज़ क्यों नहीं निकली? जबकि भीड़ में नेता के विरोधी और विपक्षी दलों के तमाम कार्यकर्ता मौजूद थे। कम से कम किसी एक का हाथ तो उतना ही चाहिए था।
भाई लोगों की इस शंका व जिज्ञासा का स्तर “राजधानी दिल्ली के एक्यूआई” की तरह बढ़ा हुआ था। इसे दूर करने का काम चाय वाले ने एक मिनट में कर दिया। जो सारी चर्चा को घंटे भर से दोनों कान लगा कर सुन रहा था। एक ज़माने में नेता के बाप के लंगोटिया यार रहे चाय वाले ने सारा राज़ खोलते हुए साफ कर दिया कि नेता की इस चुनौती के खिलाफ़ खड़े होने वाला कस्बे तो क्या पूरे सूबे में एक नहीं मिलेगा। हैरत में पड़ी मीडिया टीम को हक्का बक्का देख जोश में आए चाय वाले ने बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि “नेता ने बचपन से चाय की एक बूंद नहीं पी। दूध पीकर दारू पीने वाली जवानी तक पहुंचा पट्ठा।”
मतलब साफ था कि जिस बंदे का चाय से कभी लेना देना रहा ही नहीं, उसे चाय पिलाने वाला धरती पर क्या आसमान से टपकेगा? शातिर अंदाज़ में सत्यवाद अपना कर चुनौती देने वाला यही नेता “एक कप चाय” के बजाय “एक पैग शराब” बोलता तो एक क्या अनेक उठा देते हाथ। तो यह था लफ़्ज़ों और लफ्फाजियों का खेल। सियासी जमात को सबक़ देने वाला। सवाल उठाना हो तो वो ही उठाओ, जिसका जवाब किसी के पास न हो। सीधी सीधी कहें तो मज़े से खेत पर कब्ज़ा कर खलिहांन की ओर क़दम न रखने का दावा करो। वो भी खुले आम, चौड़े धाड़े में। एक भी माई का लाल मिल जाए उंगली उठाने वाला तो कहना। भाई साहब, कुटिल राजनीति की पतंग ऐसे कपट के धागे से बंध कर ही उड़ती है। तो सीख लो फार्मूला और बन जाओ महाराजा हरिश्चंद्र। जय रामराज्य।।
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