साहित्य के सूरज का अवसान
हिन्दी साहित्य के निर्भीक, व्यापक एवं बहुविध चिंतक डॉ. रामदरश मिश्र अब हमारे बीच नहीं रहे। कल यानी 31 अक्टूबर, 2025 को दिल्ली स्थित उनके आवास पर शताधिक आयु उपरांत उनका देहावसान हो गया । उनके न रहने की खबर से साहित्य-जगत को गहरा शोक और सदमा पहुंचा है । उनका जीवन-सफर, कृतित्व और व्यक्तित्व हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए प्रेरणास्रोत रहा है। गोरखपुर जिले के डुमरी गाँव में जन्मे श्री राम दरश मिश्र ने अपने जीवन का सफ़र स्थानीय प्राथमिक-माध्यमिक विद्यालय से प्रारंभ किया, उसके बाद बनारस (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) में शिक्षा-दीक्षा ली जहाँ से उन्होंने स्नातक, स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट तक की उपाधियाँ प्राप्त कीं। बाद में गुजरात में अध्यापन कार्य किया और फिर दिल्ली आकर अध्यापक एवं प्रोफेसर के रूप में काम किया। इस तरह उनका जीवन-पथ अध्ययन-अनुभव, गाँव-शहर, संस्कार-नवीनता के संगम से प्रभावित रहा।
श्री राम दरश मिश्र का संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन, चिंतन-मनन और पठन-पाठन में बीता।
हिंदी साहित्य के प्रति उनकी स्वाभाविक वृत्ति ने उन्हें लेखन की ओर उन्मुख किया और उन्होंने कविता, ग़ज़ल, उपन्यास, कहानी, संस्मरण, निबंध, आलोचना—लगभग सभी प्रमुख विधाओं में साहित्य सृजन किया। काव्य लेखक के रूप में उनका पहला काव्य-संग्रह ‘पथ के गीत’ 1951 में प्रकाशित हुआ। बाद में ‘बैरंग-बेनाम चिट्ठियाँ’, ‘पक गयी है धूप’, ‘काँधे पर सूरज’ जैसी कृतियाँ आईं। ग़ज़ल-शैली में उन्होंने हिन्दी को नया आयाम दिया। उन्होंने कथाकार और उपन्यासकार के रूप में भी काफी नाम अर्जित किया । गाँव-शहर की बदलती दुनिया, ग्रामीण जीवन, सामाजिक संरचनाओं की सूक्ष्मता और पात्रों का अंतर्दमन इनकी कहानियों और उपन्यासों के मूल में रहे हैं। अधिकारी विद्वान होने के कारण आलोचना और शोध के क्षेत्र में भी उनका बहुत ही प्रामाणिक और स्तरीय कार्य रहा है । ‘हिंदी उपन्यास : एक अंत्यात्रा’, ‘हिंदी कथा : अंतरंग पहचान’, ‘छायावाद का रचनालोक’ जैसी उनकी आलोचनात्मक पुस्तकों में हिन्दी साहित्य-विज्ञान को बहुत ही कुशलता और सिद्धहस्तता के साथ निरूपित और व्याख्यायित किया गया है । उन्होंने अपने कुछ संस्मरणात्मक और आत्मकथात्मक लेखों को – अपने-अपने अनुभव, परिचित विद्वान मित्र-सहचरों, प्रवास और विचारों को ‘स्मृतियों के छन्द’, ‘सहचर है समय’ आदि पुस्तकों में समाहित किया।
उनका बहुआयामी लेखन-संसार, पाठकों एवं शोधार्थियों के लिए विभिन्न विषयों पर विषय वस्तु और सामग्री का अथाह स्रोत है। विश्वविद्यालयों में उनकी कृतियों पर पीएच.डी.-एम.फिल. शोध होते रहे हैं ।
व्यापक सृजनशीलता और चहुंमुखी कीर्ति के बावजूद श्री रामदरश मिश्र का व्यक्तित्व सहज-सुगम, विनयी एवं चिंतनशील था। गाँव-मिट्टी से जुड़े रहने वाले इस साहित्यकार ने आधुनिकता-परम्परा, शहरी-ग्रामीण बीच की दूरी, व्यक्ति-समाज के बीच संवाद को अपनी भाषा में साकार किया। रिश्तों, संस्मरणों, यात्राओं और अनुभवों को उन्होंने आत्मीय भाव से व्यक्त किया। पढ़ने-लिखने के प्रति उनकी अगाध निष्ठा, जीवन-प्रतिक्रिया की तीव्रता तथा साहित्य के प्रति आदर ने उन्हें समकालीन हिन्दी में विशिष्ट स्थान दिलाया।
उनका यह कथन सार्थक है कि लिखना केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि जीवन का प्रतिबिम्ब है; और उन्होंने न केवल इस प्रतिबिम्ब को सहेजा अपितु उसे अपने जीवन में भी भरपूर जीने की कोशिश भी की। इसीलिए वे शिक्षक-लेखक-साहित्यकार तीनों रूपों में समान रूप से सम्मान्य रहे। डॉ. रामदरश मिश्र को राजधानी में रहते हुए भी अपनी ग्रामीण जड़ों का अहसास था। उन्होंने हिन्दी साहित्य की छवि को देश-विदेश में आगे बढ़ाया। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, सरस्वती सम्मान तथा हाल ही में पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत किया गया है।
उनकी अनुपस्थिति साहित्य- जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है । उनकी रचनाएँ, विचार एवं शिल्प सदैव पाठकों और लेखकों को प्रेरित करते रहेंगे। हिन्दी-साहित्य का एक युग उनके साथ समाप्त हुआ है, पर उनकी रचनाएँ वक्त के पटल पर अमर रहेंगी ।
— शिवकुमार बिलगरामी