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2 Nov 2025 · 4 min read

अठकल गठन , समस्याएँ और समाधान

#अठकल_गठन_? , #समस्याएँ_और_समाधान

मात्रिक छंदों में अठकल जी , गेयता लय के दादा जी हैं ,
जहाँ अठकल दादा जी के अंगों को छेड़ा , वहीं पर दादा जी धम्म से नीचे बैठ जाते हैं |
अठकल दादा जी के स्वरुप को देखें👇
44. 332 35 यह सही सुंदर रुप है।

233. या 323 ‌या 53. यह अठकल का विद्रूप रुप है, ऐसा रुप , प्रारंभ पंचकल बनकर लय का स्वाहा कर दादा जी को लज्जित कर देता है।

एक समस्या अठकल पर 35 पर आती है व छंद लेखक भ्रमित हो जाते हैं | तब मित्रों को अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिए।

जैसे उदाहरण को- दोहे का चरण ले लेते हैं –

गाल बजाकर क्या मिला, समय किया है नष्ट।
3. 5. ‌ 2. 3. = 13 मात्रा , √√ सही है।

अर्थात- सही अठकल + रगण ( 212) √√
या
गाल बजा कर क्या मिला ,
3. 3. 2 = सही अठकल है।
332 कह लीजिए या 35 एक ही आशय है
या
जैसे यह 👇लिखा हो
गाल बजाते क्या मिला ?
3. 5. = सही अठकल
या
गाल बजा + ते
3. 3. 2 , सही अठकल
~~~~~~
पर 35 में तगण (221)ताऊ जी को शामिल करना जबरदस्ती महफिल में प्रवेश कराना है , ठीक उसी प्रकार जैसे जगण (121) नाना जी को पूरित मंगल चौक ( चौकल ) के आगे बिठलाना है 🙏
इनसे लय, अर्थात जीजा जी नाराज होने लगते हैं 🙄🙏

त्रिकल और तगण( 221= 5 ) से लय नहीं बनती है , और न इनका जोड़ा सही है , ऐसे लगता है कि दुल्हन छोटी , लंबा दूल्हा |🥰🙏
जैसे ;
नहीं चौकोर क्यों घड़ी , इसी बात पर रुष्ट ||
3. 5. 2. 3. = 13 मात्रा है 35 का अठकल है, पर लय नहीं है।
कारण देखें 👇
इसका लय उच्चारण कीजिए…
नहीं चौ कोर क्यों घड़ी , इसी बात पर रुष्ट ||
3. 2. 3. = यह अठकल कलन से नहीं है व पंचकल बन रहा है।
या
नहीं चौको र क्यों घड़ी ,
3. 4. 1.= यह अठकल कलन से नहीं है।

दिखने में तो 3 5 थे , पर उच्चारण गेयता लय में अलग ही दौड़ लगा रहे हैं , जैसे चंगा घोड़ा – लंँगड़ी घोड़ी
यह 221 वाले शब्द. ” तगण “कहलाते हैं।
जैसे – चालाक चालीस चौकौर तूफान बाजार
जिनका उच्चारण – चा + लाक ‌, चा+ लीस
अर्थात द्विकल + त्रिकल है , या चौकल + लघु होता है।

तीर तूफान में चले, ××
तूफान तीर में चले, ××
दोनों चरणों में प्रारंभ के अठकल लड़खड़ा रहे हैं।
किंतु
35 के अठकल में यगण ( 122 ) चाचा जी सामंजस्य बिठला लेते हैं।
जैसे
वहाँ हमारा कुछ नहीं,
वहाँ हमा+रा कुछ नहीं,

आशा है , कुछ समाधान हम दे पाएँ हों , जो सहमत हों , स्वागत है , जो असहमत हों , उनको भी धन्यवाद कि यह आलेख पढ़ा है |🙏

आलेख – सुभाष सिंघई
जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
एम० ए० हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र
पूर्व भाषानुदेशक आई टी आई
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
यह पिछला आलेख है, आपकी सेवा में पुनः प्रसारित है 👇👇

एक प्रश्न आया था #आठवी_नौवीं_संयुक्त_मात्रा_में
#लय_दुर्घटना क्या है ?? #समाधान 👇👇

उदाहरणार्थ – चौपाई छंद #चौकल और #अठकल के मेल से बनता है।
समस्त संभावनाएँ निम्न हैं।मात्रा बाँट निम्न है।
4-4-4-4, 8-8, 4-4-8, 8-4-4. 4-8-4,
इनमें देखें तब
4-4-4-4, 8-8, 4-4-8, 8-4-4. में योग तो दो अठकल के ही बन रहे हैं | पर हम चर्चा करते हैं – 👉 4-8-4, की।

अठकल बनते हैं 👉– 44. 332 35.
से…

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर
का विशेष उदाहरण आठवीं नौवीं संयुक्त मात्रा में आता है , फिर भी लय है , सभी स्वीकार भी करते हैं क्योंकि 4 8 4 है!!

जय‌ हनु मान ज्ञान गुन सागर
जय हनु =4. मान ज्ञान गुन 8 सागर 4

कोई लय दुर्घटना नहीं हैं ,और 4 8 4 है व हनुमान उच्चारण करने पर हनु मान दो भागों में उच्चारित होता है।

पर हर कोई तुलसीदास जी नहीं हैं, कि लय सम्हाल ले जाएँ।
देखा-देखी आठवीं नौवीं को, मित्र गण संयुक्त कर देते हैं।

जैसे- #बड़े_दयालु_वीर_बजरंगी
3. 4. ‌ 3. 2. 4 = 16
मात्रा गिन लीजिए ☝️
आठवीं नौवीं मात्रा (वी) संयुक्त है , कलन पाठक गण मिलाते रहें |

अब इस चौपाई को 484 की मात्रा बाँट में ले जाएँ

बड़े, दया लु +वी, र + बज, रंगी,
3. 3. 3. 3. 4. = चार त्रिकल एक साथ आ रहे हैं ×××

अब इसे (” ले जोड़ा की फौज” या “भानुमति के पिटारे ” ) से सही सिद्ध करते हैं।
बडे +द. यालु वीर बज . रंगी
4. 3. 3. 2. 4 = 4 8 4 बाँट हो गया
बड़े + द से जगण बन रहा है , पर तर्क हेतु खंडित जगण है।

बस इसे ही “लय दुर्घटना ” कहते हैं 🙏 क्योंकि “” बड़े दयालु”‘
गेय करने के बाद प्रवाह में थोड़ा रुकना पड़ेगा, तभी “वीर बजरंगी” गेय आगे बढ़े़गा |
पर एफ बी पर मित्र मात्रा गिनाते हैं।
प्राचीन कवि लय से चलते थे |

इसीलिए विद्वान आठवीं नौवीं संयुक्त करने से बचाव का परामर्श देते हैं | बहुत कुशल जन ही आठवीं नौवीं संयुक्त करके लय ला पाते हैं।

पिछले दिनों एक तथाकथित आचार्य जी ने भी अपने दोहे के
पंचकल प्रारंभ चरण को ऐसे ही “”ले जोड़ा की फौज”” से कलन बनाए थे |

यह आलेख किसी विशेष पर उल्लेखित नहीं किया गया है ,यह उठते प्रश्नों के उत्तर हैं।
जो सबके लिए उपयोगी हो सकते हैं। इसीलिए प्रकाश डाला है।
स्वीकार या अस्वीकार करना पाठक / कवि मित्रों का अधिकार है |

आलेख – सुभाष सिंघई
जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
एम० ए० हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र
पूर्व भाषानुदेशक आई टी आई

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