*दृश्य जगत में सबके रिश्ते, सबके साथ बदलते हैं (हिंदी गजल)*
दृश्य जगत में सबके रिश्ते, सबके साथ बदलते हैं (हिंदी गजल)
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1)
दृश्य जगत में सबके रिश्ते, सबके साथ बदलते हैं
कल तक थे जो बहुत करीबी, अक्सर वे ही छलते हैं
2)
जब तक अच्छे दिन थे सबने, साथ निभाया था मन से
बुरे दिनों में अपने बोले, अच्छा अब हम चलते हैं
3)
कई बार यह लगा ग्रहों की, दशा बुरा ही फल देगी
कई बार लगता है श्रम से, बुरे नतीजे टलते हैं
4)
राजमहल के दिन अब बीते, राजा-रानी चले गए
लोकतंत्र के नायक नूतन, राजा बने टहलते हैं
5)
समय बिगड़ता-बनता रहता, चला समय पर किसका वश
जाने कितने सूरज उगते, हमने देखे ढलते हैं
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रचयिता: रवि प्रकाश
बाजार सर्राफा (निकट मिस्टन गंज), रामपुर, उत्तर प्रदेश मोबाइल 9997615451