शहर की हाय
यह शायद एक छिपा हुआ दृष्टिकोण है,जिसे संभवतः मैं ही देख पा रहा हूँ—
कि जब परमाणु हथियार किसी शहर को श्मशान में बदल देते हैं, तो वे उन मजदूरों के साथ न्याय करते प्रतीत होते हैं, जो गाँव से आकर उसी शहर को खड़ा करते हैं। वे गर्मी, सर्दी और बरसात में दिन-रात मेहनत करके बड़ी-बड़ी इमारतें बनाते हैं, लेकिन बदले में उन्हें कम वेतन, कम सुविधाएँ और अपमान मिलता है। दुख की बात यह है कि उन्हें यह तक पता नहीं होता कि कैलेंडर में एक दिन उनके नाम से भी दर्ज है—‘मज़दूर दिवस’।
इसलिए, जब वही शहर परमाणु विस्फोट की आग में राख हो जाता है, तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे उस शहर ने उन मजदूरों की ‘हाय’ का उत्तर पा लिया हो।
~ प्रतीक झा ‘ओप्पी’
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज