मैं लोगों की भीड़ में खोया हुआ एक पन्ना हूँ जो किताब से फिसल
मैं लोगों की भीड़ में खोया हुआ एक पन्ना हूँ जो किताब से फिसलकर कहीं दब गया हो। समय रुक-रुक कर चलता है, हर पल एक अनंत शून्य में डूबता हुआ लगता है। भीड़ मेरे चारों ओर मंडराती है, पर वह मेरे अकेलेपन का एक और परत बनाती है जैसे कोई दीवार, जो मेरे और दुनिया के बीच खड़ी हो गई है।