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2 Nov 2025 · 1 min read

यह राह नवीन है

जारी रखी सफर नारी अपनी
बंधन तोड़ती, राह बनाती हुई
आँचल में रख ममता-छावनी
मातृत्व का भार निभाती हुई
संघर्ष उसका, जीवन उसकी,
हर मोड़ पर देती रही परीक्षा
ठोकर खाकर, आहत होकर
ग्रहण की सदा जग की उपेक्षा.
घर की चौखट, समाज की रीतें,
सबने उसको बाँधना चाहा,
पर अपनी इच्छा-शक्ति पंखों से
मन पंछी को नभ में सदा उडाया.
वो माँ बनी, बहन बनी,पत्नी बन
जिम्मेवारियाँ अपनी सदा निभाई
हर रूप में नारी-शक्ति की शुचिता
कदम कदम पर सर्वत्र दिखलाई.
आज भी चलती है वो डगर पर,
सपनों की जो राह कठिन है,
पर अब न रुकती, न झुकती वो —
क्योंकि जान गई यह राह नवीन है।

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