दिल्ली विष की गगरी
अंधेरी रैन जभी घिरि आवै,
अलकन साँझ सँवारत है।
पलकन बीच प्रभात जुगै है,
विस्मित भोर सो हारत है।
खग-कुल मौन हुवै चित भीतर,
कालिमा रात्रि पुकारत है।
मुखड़े पे निशि रूप सजावै,
बातन खंडन डारत है।
आँचर रंग बदलै छन-छन में,
सूरज ऊगै औ व्योम जरै।
यह जो रूप दिखै छलना है,
मन मेरो जो सो मर्म करै।
बिनु रितु मेघ बरै यह जानो,
नभ में काजल सोई भरै।
यह तो मिथ्या-नगरी सजनी,
दिल्ली विष की गगरी ठहरै।
कृत्रिम वारि झरी हिय भारी,
माटी बूँद को प्यासी रही।
पवन हलाहल बाँटि फिरै है,
धूल रसायन घोंटि गही।
बस्ती भारी बोझिल जानो,
किन्तु खुल्लै मुख हास बही।
मोहि बहिष्कृत करै यह नगरी,
बाँह पसारि तऊ तकि रही।
पाटलिपुत्र की आस हिये धरि,
दिल्ली खोजति अंधियारे में।
भव की रानी, मसि-महल सिरजूं,
नहिं पहचानी जग-जारे में।
जब यह ‘दिल्ली’ मुखरित होवै,
ऋतु पलटे क्षण एक बिचारे में।
कील गड़ी धरती महँ ढीली,
कष्ट अपार सहौं पिय प्यारे में।
@स्वरचित व मौलिक
कवयित्री: शालिनी राय ‘डिम्पल’
आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश।