ज्योर्तिमय राम
///ज्योर्तिमय राम///
क्षीर उदधि सम विग्रह मनोहर ,
सकल सुमंगल धारित राम।
अनंत दयानिधि जननायक बंधु,
दशरथ नन्दन कृपा निधान ।।
सीता के संग राम सदा ही ,
ज्योतिर्मय बन रहते थे ।
अवतारी थे पर इस जग में,
मानव कष्ट सदा सहते थे।।
कभी उन्होंने नहीं दिखलाया,
अपनी पराशक्ति का योग।
जो कुछ लिखा ब्रह्मा ने भाग्य में,
वह सब भोगा जीवन भोग।।
प्रकृति में मनुज की जीवन लीला,
कितने पाती निशि दिन कष्ट।
स्वयं भोगा उसे परात्पर ब्रह्म ने,
चरित उतारा कैसे हो वह नष्ट।।
रखा आदर्श सम्मुख मानव के,
कैसे जीवंत रहेगी मानवता।
दानवता पर सदा विजयी रहेगी,
धर्माचारी होगी शक्ति क्षमता।।
रहे प्रफुल्लित फलित पुष्पित,
जगती में अपनी मानवता।
काल भैरव तुमको बनना होगा,
जब शक्ति दिखाए दानवता।।
प्रभु राम के चरणों में अर्पित,
मानवता के धर्मचर विधान।
नित्य निरंतर मिलता रहेगा,
प्रभु राम का अक्षय वरदान।।
जग में प्रभु तुम अन्त्य शरण हो,
तब हम किसका ध्यान करें।
शरणागत होकर द्वार खड़े हम,
कृपा तुम्हारी अमृत प्राण भरे।।
स्वरचित मौलिक रचना
रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)