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1 Nov 2025 · 1 min read

आदर्शवादी पुरूष

आज का आदमी मंहगाई की मार झेलता ,
परिवार प्रति कर्तव्य- बोझ से दबा सब सहता ,

व्यवसाय की उधेड़बुन में लगा कमाई के विकल्प तलाशता ,
समाज की परंपरा एवं धार्मिक रीति- रिवाजों के चक्र में उलझता ,
विद्रोह करने के प्रयास पर स्वंय को एकाकी पाता ,

कदाचित पुरूष होना, उसकी नियति प्रदत्त
प्रथम त्रुटि है ,
जो उसके प्रति सहानुभूति से उसे
वंचित करती है ,

कर्मनिष्ठा ,कर्तव्यनिष्ठा एवं समर्पण के आदर्शों का पाठ उसे पढ़ाया जाता है ,
परन्तु संबंधों को उसके प्रति कर्तव्य-बोध का संज्ञान नही कराया जाता है ,

परिवार प्रति समर्पण ही उसका जीवन है ,
बलिदान ही उसका आचरण है ,

जीवनपर्यंत वह परिवार के लिए धन अर्जित करता है , सम्पत्ति बनाता है
अन्त में आदर्शवाद का एक उदाहरण बन सब कुछ उनके लिए छोड़कर विदा होता है।

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