जागो !
कहावत हमने सुनी थी ,
खोदा पहाड़ निकली चुहिया ,
खोदी मस्जिदें, मज़ारें बहुत हमने
कुछ ना निकला भैया ,
हाँ एक नफ़रत का साँप जरूर निकल आया ,
जिसने बहुत बवाल मचाया लोगोंं को लड़वाया ,
अवाम में नफ़रत का ज़हर खूब फैलाया ,
दोस्त को दुश्मन , दुश्मन को दोस्त बनाया ,
फ़िरका-परस्त सोच को आगे बढ़ाया ,
ज़ेहनी- ग़ुलाम बना इशारों पर लोगों को नचाया ,
हमें तो कुछ मिला नही पर सियासी मंसूबे पूरे हुए ,
कल तक जो सुख-दुःख में हमारे साथ थे पराये हुए ,
सुना है ! अब ताजमहल में भी मंदिर खोज रहे हैं ,
चुनाव जीतने के लिए अवाम में नफ़रत फैला रहे हैं ,
अब भी वक़्त रहते जाग जाओ ,
इन फ़रेबे मुखौटों के पीछे छिपे चेहरों को पहचान जाओ ,
वरना जब्र और तशद्दुद की ज़िंदगी जीने को
मजबूर किये जाओगे ,
फिर ख़ुद अपनी नज़रों से गिरकर अपने आप को
कोसते पछताते रह जाओगे।