"मुफ़लिसी" ग़ज़ल
ताना था, ज़माने का, हरेक, कर सहन लिया,
निकले जो घर से,ओढ़ था सर पे क़फ़न लिया।
हंस-हंस के गुज़ारा है हमने दौरे-मुफ़लिसी,
जैसा जो मिल गया, उसे वैसा पहन लिया।
पी-पी के अश्क, प्यास तो काफ़ूर हो गई,
हर भूख पर, ग़मों को, चबाकर निगल लिया।
बांहें समेट लूं कभी, ढक लूं मैं उंगलियां,
गर्मी लगे, न ठंड, ऐसा पैरहन लिया।
है फ़ख़्र, कि अब भी मिरा, क़ायम ज़मीर है,
था ख़्वाहिशों को दिल में अपने कर दफ़न लिया।
नंगी ज़मीं पे लेटकर, शबनम जो ओढ़ ली,
तारों की लौ में गर्म, अपना कर बदन लिया।
था रश्क़, ज़माने को, मस्त मुझको देख कर,
कैसे अना का मैंने, ख़ुद में कर दहन लिया।
आई जो ख़बर, आ रहा, मेहमान है कोई,
झाड़ू लगा के, झोपड़ी को, कर चमन लिया।
ग़रदन उठा के यूं, भले चलता था शान से,
बूढ़ा फ़क़ीर भी दिखा, तो कर नमन लिया।
मरने पे सब कहेंगे, था “आशा” बहुत भला,
रुसवाइयों को उसने ना, अपने ज़हन लिया..!